बुढ़ापा एक ठहरा हुआ समंदर है।
जहाँ लहरें कम, यादें ज्यादा हैं।
हर सवाल का जवाब भीतर रहता है।
पर सुनने वाला कोई पास नहीं रहता है।
आँखों में बीते कल का साया है।
हाथों में अनुभव की गहरी माया है।
कदम धीरे चलते, मन तेज भागता है।
बीता बचपन फिर से पुकारता है।
चुप्पी भी अब दोस्त सी लगती है।
रातें अक्सर लंबी सी लगती हैं।
पुरानी तस्वीरें मुस्कुराती हैं।
खामोश कहानियाँ दोहराती हैं।
सपनों की उम्र अब थक गई है।
इच्छाओं की दौड़ भी रुक गई है।
अपनों की भीड़ कम होती जाती है।
यादों की दुनिया ही संग रह जाती है।
दिल में बातें बहुत छुपी रहती हैं।
पर होंठों पर हँसी सजी रहती है।
समय अपने कदम धीरे रखता है।
बुढ़ापा भीतर से चुपचाप बहता है।
हर उत्तर है, कोई प्रश्न नहीं है।
फिर भी जीवन में पूर्ण विराम नहीं है।