उसकी ख़ामोशी भी किसी शोर से कम नहीं थी।
हर चुप्पी में एक अधूरी चीख छिपी रहती थी।
वह दर्द को अपने साथ ओढ़कर चलती रही।
आग में जलकर भी मुस्कान सँभालती रही।
हँसी उसके चेहरे का केवल एक आवरण थी।
अंदर भावनाओं का गहरा तूफ़ान चलता रहा।
हर रास्ते ने उसे थोड़ा मोड़ना चाहा।
पर उसकी हिम्मत ने कभी टूटना नहीं चाहा।
लोग उसे कमजोर समझने की भूल करते रहे।
क्योंकि वह अपनी आवाज़ धीमी रखती रही।
पर शांत लहरों की गहराई कौन समझ पाया?
समंदर की ताकत भी भीतर ही छुपी रही।
उसकी आँखों ने बहुत दर्द सहना सीख लिया।
शिकायत का रास्ता उसने चुनना नहीं सीखा।
जो उसके घावों की गहराई नहीं समझ सके।
उनके बीच भी वह आगे बढ़ती ही रही।
उसकी आत्मा शब्दों से भी आगे चलती थी।
मौन में भी वह अपना सत्य गढ़ती रही।
हर संघर्ष को उसने एक गीत बना लिया।
हर हार से नया साहस चुनती रही।
वह केवल एक स्त्री का किरदार नहीं थी।
वह खुद में एक संपूर्ण दुनिया बन गई थी।
बिना शोर किए अपनी पहचान रचती हुई।
इतिहास में अपनी अमर छाप छोड़ गई थी।