भटक रहे बंद गिरधारी, न गठरी भारी, न जेब भरी।
हाथ खाली, माथा तना, पर शोर ऐसा जैसे दौलत खड़ी।
न लुटिया उनकी, न थाली, न घर में दाल मसाली।
मंच सजा, माइक खड़ा, आवाज़ ऊँची, बात निराली।
चौराहे पर खड़े होकर बोले—”लूट मची है भारी!”
भीड़ ने पूछा—”किसकी?” बोले—”हमारी, बस हमारी!”
किसने लूटा? कब लूटा? माल कहाँ पर गया सारा?
बोले मुस्काकर—”अंधेरे में था कोई अपना प्यारा।”
गली-गली पोस्टर चिपके, आँसू जैसे फोटोशॉप किए।
कैप्शन लिखा—”न्याय चाहिए”, नीचे सिग्नेचर कई लिए।
कुर्सी को जो कल तक माँ कहते, आज ज़मीन पर रोते हैं।
ज़मीन खिसकने का डर दिखाकर नए बहाने बोते हैं।
कल तक जिनके जेब में हाथ थे अपने आराम से।
आज वही चिल्ला रहे हैं—”सपने कटे हैं काम से!”
न बटुआ गया, न पोटली, न चप्पल गई, न रूमाल।
दर्द ऐसा जताया जैसे गिर गया इतिहास का लाल।
एक बोला—”हम ईमानदार थे, जनाब!”
पीछे से आवाज़ आई—”तभी बदला जनता का हिसाब!”
फिर शुरू हुआ भाषण भारी, आँकड़े, इतिहास पुराना।
साथ आँसू, थोड़ी गाली, भविष्य का डर दिखाना।
भीड़ में बच्चा बोला—”चोरी क्या होती है चाचा?”
चाचा बोले—”जब वोट न मिले, वही समझो माचा!”
कोई बोला—”जनता नासमझ है, जनता बहक गई!”
किसी ने कहा—”शायद हमारी समझ ही थक गई।”
हवा में हाथ, ज़मीन पर पैर, आँखों में साज़िश धूल।
हर हार के बाद उगता है नया ‘चोरी’ वाला फूल।
रात को स्टूडियो में बैठकर फिर वही कहानी कहते।
एंकर पूछे—”सबूत?” वो बोले—”भावना को सबूत कहते!”
तालियाँ बजीं, विज्ञापन आया, तर्क को मिली सजा।
सुबह फिर चौराहा, फिर माइक, फिर वही पुराना मज़ा।
गिरधारी फिर भटके हुए, जिनके पास कुछ था नहीं।
पर शोर ऐसा जैसे दुनिया की सारी कुर्सी वही कहीं।
कविता हँसकर पूछे—अगर जेब ही खाली थी भाई।
तो चोरी कहाँ से हुई, इतना शोर क्यों मचाई?
सच अगर हल्का था इतना, तो आवाज़ भारी क्यों लगाई?
दर्द अगर अपना था, तो दुनिया पर कहानी क्यों बनाई?
खाली हाथों का भी कभी इतना अहंकार कहाँ होता।
सच अगर कमजोर हो तो इतना प्रचार कहाँ होता।
भटके हुए शब्द भी कभी खुद का बोझ ढोते हैं।
और झूठ के पहाड़ अक्सर शोर में ही सोते हैं।