पचपन पार का मर्द चुपचाप जीवन चलता रहता
कनपटियों पर सफेदी उम्र का संगीत सुनाती है
कंधों पर जिम्मेदारी का भारी पहाड़ टिका है
चेहरे की झूठी मुस्कान दर्द छिपाकर रखती है
अधूरे सपने दिल के अंदर कहीं दबे रहते
परिवार की खुशियों में खुद को मिटाता रहता है
समय की धारा में वह धीरे धीरे बहता है
जो नहीं मिला अपनों को दिलाने की ठानता
दिन भर दुनिया से लड़कर थककर टूट जाता
शाम को घर की चौखट पर वापस लौट आता
बच्चों के सवालों के बीच खुद को पाता है
कभी मुस्कुराता है कभी चुपचाप खामोश रहता
“पापा ये लाए वो क्यों नहीं” वह सुनता
जेब का खालीपन शब्दों में कभी नहीं कहता
प्यार से समझाता है कभी डाँट भी देता
आँख का आँसू अंदर ही अंदर पी लेता
पत्नी की बातें घर की चिंता बन जाती
बच्चों की परवरिश पर हर दिन बहस चलती
पड़ोस की बातें भी चुपचाप सह लेता
हर ज़हर जीवन का वह पानी संग पीता
हलाहल पीकर भी नीलकंठ जैसा बन जाता
जीने की चाह में खुद को ही जलाता
रात को बिस्तर पर थककर सो जाता
सुबह फिर सूरज बनकर उठना पड़ता
घर चलता रहे यही उसकी जिम्मेदारी रहती
बच्चों का सपना पूरा करना उसकी नियति
अपनों की खुशी में अपनी खुशी छिपाता
यही जीवन है मर्द चुपचाप जीता जाता