पत्नी है तो जीवन में सब कुछ है,
वह घर की रानी, सम्मान की धुरी है।
तुम सिर ऊँचा करके चलते हो जग में,
उसके त्याग से ही यह गरिमा पूरी है।
तुम्हारी सुविधा-असुविधा वह सहती,
अकारण क्रोध भी हँसकर सहती है।
तुम्हारे सुख में खिल उठती है,
दुःख में चुपचाप आँसू बहती है।
रविवार भी उसके लिए काम का दिन,
न उसके लिए कोई त्यौहार रहा।
“चाय लाओ, पानी लाओ” की आवाज़,
उसका जीवन बस सेवा का संसार रहा।
तुम कहते रहे — “तुम्हें समझ कब आएगी?”
पर उसकी समझ से ही घर चलता था।
उसकी बुद्धि, धैर्य और प्रेम से,
तुम्हारा हर दिन सुरक्षित ढलता था।
एक रात अचानक वह चली गई,
घर में रुदन की गूँज उठी।
अंतिम दर्शन के बीच खड़ी,
उसकी आत्मा जैसे धीमे से बोली—
मैं अब जा रही हूँ, लौट न पाऊँगी,
साथ निभाने का वचन याद है मुझे।
पर किसे पता था इस जीवन में,
अकेले ही जाना पड़ेगा तुझे।
मुझे जाने दो, अब रोक न पाओगे,
दर्द बहुत है, पर ठहर न पाऊँगी।
मन मेरा भी भर आया है,
पर अब लौटकर न आ पाऊँगी।
मेरे जाने पर इतना मत रोना,
बेटियों को संभालो, धीरज रखना।
पोते की “नानी” पुकार अधूरी रही,
उस पीड़ा को हृदय में ही रखना।
तुम अपने को मजबूत बनाना,
ढीले मत पड़ना हालातों से।
जन्म लिया है जिसने जग में,
वह जाता है अपने ही हाथों से।
धीरे-धीरे मुझे कम याद करना,
जीवन की राह पर लौट जाना।
काम-काज में मन लगाना,
मेरे बिना जीना सीख जाना।
बीपी-शुगर का ध्यान तुम्हें रखना,
मीठा कम और दवा समय से लेना।
चाय देर से मिले तो क्रोध न करना,
बेटी पर व्यर्थ न गुस्सा होना।
दामाद-बेटी कुछ भी कहें तो,
मुस्कुराकर सब सह लेना।
नम्रता से हर बात निभाना,
मन में कोई राग न रखना।
सुबह स्वयं उठने की आदत डालो,
किसी की प्रतीक्षा मत करना।
अगर मुझसे कोई भूल हुई हो,
तो अंतर्मन से मुझे क्षमा करना।
भगवान की पूजा मत भूलना,
धैर्य और प्रेम को साथ रखना।
हम फिर शायद न मिल पाएँ,
पर मेरे हिस्से का भी जीवन जीना।
मेरी कमी खले तो चुप रहना,
पर कभी स्वयं को टूटने मत देना।
अब विदा की घड़ी आ पहुँची है—
बस… मुझे जाने दो… मुझे जाने दो।
मेरी छोटी बहन पिंकी को समर्पित