आज ऊपर बैठी आत्मा ने ठहाका लगाया है,
देखो, आज मेरे बच्चों ने पंडित को बुलाया है।
कितने जतन से पकवान सजाए गए हैं,
बड़े आदर से सबको परोसे और खिलाए गए हैं।
जिन स्वादों को तरसती रही मैं जीवन भर,
आज वही व्यंजन प्रेम से बनाए गए हैं।
कौवे और कुत्तों तक को दावत दी गई,
सबको स्नेह से कौर खिलाए गए हैं।
पर याद है क्या, जब मैं घर में थी,
मेरे लिए ही दरवाज़े बंद पाए गए हैं।
जगह नहीं थी मेरे अपने आशियाने में,
वृद्धाश्रम के रास्ते दिखाए गए हैं।
आज मेरी तस्वीर भगवान संग सजी है,
दीपक और फूलों से चौखट सजाए गए हैं।
पाँच सौ का नोट, मिठाई और नए वस्त्र,
सब मेरे नाम से चढ़ाए गए हैं।
कैसा यह दिखावा, कैसी यह श्रद्धा,
अपने ही मन को बहलाए गए हैं।
डरते हैं कहीं आत्मा न रूठ जाए,
इस भय से कर्म निभाए गए हैं।
अरे, क्या इतना भी नहीं समझ पाए,
माँ-बाप कभी संतानों से खफा नहीं होते हैं।
जीते जी दे दो थोड़ा समय और सम्मान,
उन्हें बस प्रेम चाहिए, धन और पकवान नहीं होते