अच्छी थी अपनी पगडंडी,
सड़कों पर अब जाम बहुत है।
फुर्र हुई सारी फुर्सत,
हर चेहरे पर काम बहुत है।
नहीं रही अब बूढ़ों की कीमत,
हर बच्चा खुद में ज्ञानी बहुत है।
उजड़ गए आँगन-बाग़ हमारे,
दो गमलों में शान बहुत है।
मट्ठा-दही से दूरी ऐसी,
कहते हैं इसमें जुकाम बहुत है।
चाय की चुस्की लेते ही,
बोलें इसमें आराम बहुत है।
बंद हुई अब चिट्ठी-पत्री,
व्हाट्सएप पर पैगाम बहुत है।
ए.सी. के हम इतने आदी,
बाहर का मौसम धाम बहुत है।
झुके हुए हैं नन्हें कंधे,
बस्तों में सामान बहुत है।
रिश्तों में अब गर्मी कम है,
अकड़-ऐंठ का मान बहुत है।
सुविधाओं का ढेर लगा है,
फिर भी मन हैरान बहुत है।