जीवन के कुछ गूढ़ रहस्य,
आज भी अनसुलझे रह जाते हैं।
हम और तुम चलते रहे,
पर कई मोड़ समझ न पाते हैं।
दुनिया का हिस्सा बनते-बनते,
कितने सपने पीछे छूट गए।
कुछ ने मंज़िल थाम ली हाथों में,
कुछ राहों में ही टूट गए।
सच यही है, हकीकतों ने
हमको गोद में लेकर पाला है।
धूप में जलकर, बारिश में भीगकर,
संघर्षों ने ही संभाला है।
स्लेट की बत्ती जीभ से छूकर,
कैल्शियम पूरा करते थे।
मासूमियत के उस विज्ञान पर,
हम सचमुच विश्वास करते थे।
पढ़ाई का सारा तनाव,
पेन्सिल चबाकर मिटाया है।
रबर से पहले दांतों ने ही
गलती को दूर भगाया है।
किताबों में मोरपंख रखकर,
होशियार बन जाने का सपना था।
जिल्द चढ़ी नई किताबों में,
हर दिन जैसे कोई अपना था।
नए बस्ते की खुशबू में,
पूरा उत्सव बस जाता था।
छोटी-छोटी खुशियों में ही
सारा संसार समाता था।
माता-पिता न आते स्कूल,
न पूछते किस कक्षा में हैं।
फिर भी संस्कारों की दौलत से
हम सबसे सच्चे बच्चे थे।
साइकिल के डंडे पर एक,
कैरियर पर दूजा साथी था।
तीन सपनों की एक सवारी,
हर रास्ता अपना साथी था।
डांट पड़ी तो रो लिए,
मुर्गा बनना आम बात थी।
न ईगो था, न शिकवा कोई,
बस हँस देना ही सौगात थी।
कभी न कह पाए खुलकर हम,
माता-पिता से प्रेम अपार।
“आई लव यू” शब्द न सीखे,
पर दिल में था सारा संसार।
दादाजी की मीठी आवाज़,
“मेरा नाम करेगा रोशन” गाती।
फिर हमने भी सपने गाए,
“पापा कहते हैं…” धुन सुनाती।
अब बच्चे गुनगुनाते हैं,
नए ज़माने की परिभाषा।
बापू सेहत के लिए हानिकारक,
यही है आज की भाषा।
सचमुच सोचो तो लगता है,
कहाँ से कहाँ हम आ गए।
भटूरे में पहले ईनो डाला,
फिर ईनो पीकर पछता गए।
एक बार मुड़कर देखो ज़रा,
बचपन अब भी पुकार रहा।
सादगी के उन पन्नों से,
जीवन हमको निहार रहा।