अब किसी आईने पे भरोसा नहीं,
हर अक्स में सच्चाई का किस्सा नहीं।
जो नहीं होता, वही दिखा देते हैं लोग,
ख्वाबों को भी सच बता देते हैं लोग।
चुप रहो तो तन्हाई का इल्ज़ाम मिले,
बोल दो तो चर्चाओं के नाम मिले।
सच कहो तो दुश्मन ठहरा देते हैं,
झूठ को सौ बार सजा देते हैं।
रिश्तों को भी बाजार बना देते हैं,
अपनापन यूँ ही गँवा देते हैं।
उम्मीदों का बोझ लाद देते हैं,
साथ चलकर भी फासले बढ़ा देते हैं।
आईनों को सच बोलने की सज़ा मिली,
धूल की चादर उन पर चढ़ा दी गई।
चेहरों पर नक़ाब सजा देते हैं,
हर अक्स को नया रंग दे देते हैं।
हमने चाहा था सुकून की छाँव,
मिला बस सवालों का गाँव।
दिल की बात समझे बिना,
दूरी की दीवार उठा देते हैं लोग।
जो हक़ीक़त थी, अफसाना बना दी,
सच की हर लौ बुझा दी।
खामोशी को भी शोर बना देते हैं,
आँसुओं को मौसम बता देते हैं।
डूबते को किनारा दिखाते हैं,
फिर वही किनारा हटा जाते हैं।
दोस्ती का चोला पहनाते हैं,
दिल का सौदा कर जाते हैं।
रौशनी माँगो तो घर जला दें,
चिरागों को भी आंधी बना दें।
छोटे लम्हों को बड़ा बना दें,
हर बात का तमाशा रचा दें।
इक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं,
सच की राहों को धुंधला कर देते हैं।
अपनों के बीच भी तन्हा कर दें,
ज़ख्मों को फिर से हरा कर दें।
मोहब्बत की बातें महफिलों में हों,
दिलों में फिर भी दीवारें हों।
हर अपने को अजनबी बना दें,
प्यार को भी सौदा बना दें।
अब किसी आईने पे भरोसा नहीं,
इस शहर में कोई वैसा नहीं।
हर अक्स बदलता रहता है यहाँ,
सच भी बिकता रहता है यहाँ।