जब भी ठोकर खाकर गिरता हूँ,
अपने ही पापों से डरता हूँ।
बीते लम्हे साए बन जाते,
रातों में चुपचाप बुलाते।
खामोशी चीख-सी लगती है,
हर सांस में टीस-सी जगती है।
भूत पापों के घेरे रहते,
मन के आँगन डेरा रखते।
ख्वाबों में डर आकार लेते,
जख्म पुराने फिर से चेतें।
दस्तक देती यादों की आहट,
दिल में उठती टीस की सरगम।
क्यों गलती की ऐसी सजा है,
रूह तक काँपे हर सदा है।
अंधियारे में साए चलते,
मन के दीपक धीरे जलते।
रात गहराए, भय बढ़ जाता,
सन्नाटा भी शोर मचाता।
काश मुझे क्षमा कर दे खुदा,
धो दे मन का सारा गिला।
दिल के आईने से धुंध हटे,
पछतावे के बादल सब छँटें।
सवेरा आए नई किरण संग,
जीवन भर दे उजला रंग।