तीन समस्याएँ बढ़ती जाएँ,
समाज की राहें उलझती जाएँ।
पहली पीड़ा बेरोज़गारी,
सपनों पर छाई लाचारी।
हाथों में श्रम, मगर काम नहीं,
आशा का सूरज तमाम नहीं।
रोज़ी की राह में भटके इंसान,
धीरे-धीरे टूटे अरमान।
दूजी विडंबना अजीब कहानी,
काम पड़े हैं, पर नहीं है प्राणी।
खेत-खलिहान सूने पड़े,
कारखानों के पहिए जड़े।
कौशल की कसौटी कौन चढ़े,
योग्यता की ज्योति कहाँ जले?
श्रम का सूरज धुंध में खोए,
अवसर के दीपक कम ही संजोए।
तीसरी चिंता सबसे भारी,
कर्तव्य भूले नौकरीधारी।
दफ़्तर में सपनों के जाल,
समय हुआ जैसे कंगाल।
मेहनत का मान कहाँ दिखे,
ईमान की लौ क्यों न बहे?
इन तीनों गाँठों का हल यही,
हुनर-सम्मान की राह सही।
जब हर हाथ को श्रम का मान,
तभी बनेगा सशक्त राष्ट्र महान।