पहली बार जब बिस्तर पर पड़ी,
तब अपनी कीमत समझ में पड़ी।
झाड़ू-पोछा, बर्तन-कपड़े,
हर काम के भाव थे चढ़े।
खाना चार हज़ार बताया,
चाय-नाश्ते का भी हिसाब लगाया।
ड्रेसिंग, सफ़ाई, सारा काम,
दस हज़ार में भी अधूरा नाम।
घर में कोई बाई टिक न पाई,
और मैं बरसों से यहाँ निभाई।
बिना सैलरी के सेवा की,
चुपचाप हर जिम्मेदारी ली।
बीस बरस यूँ ही गुज़र गए,
सपनों से घर के रंग भर गए।
कहते रहे—“कमाती नहीं”,
पर बचत मेरी गिनी नहीं।
मकान को घर बनाया मैंने,
हर कोना सजाया अपने सपने से।
तुम बाहर दुनिया से लड़े,
मैं भीतर दीवारों से जूझी खड़े।
तन्हाई से भी बात की,
हर आहट में सौगात दी।
काश समझ पाते मेरे काम,
न कहते इसे बस एक नाम।
“घरवाली” से आगे पहचान,
एक इंसान का भी हो सम्मान।
अब जब थकान ने घेरा डाला,
तब खुद का मूल्य नज़र में डाला।
क्योंकि मैं थी तो घर भी था,
मेरे होने से ही सुकून भी था।