ज़िंदगी अजीब तमाशा है, हर चेहरा अपना-सा लगता है।
पर भीतर कहीं गणित छुपा, हर रिश्ता लाभ में तौलता है।
वकील की दुआ यही रहे, तू किसी मुकदमे में फँस जाए।
कानून की मोटी किताबें, तेरे ही ख़िलाफ़ खुल जाएँ।
डॉक्टर चाहे तू बीमार पड़े, तेरे दर्द में उसकी कमाई हो।
तेरी दवा और तेरी जाँच से, उसकी क्लिनिक में रौनक छाई हो।
पुलिसवाला देखे शक की नज़र, तेरे जुर्म में उसका मान बढ़े।
तेरी हथकड़ी उसकी शोभा, तेरी गिरफ़्तारी से पद चढ़े।
गुरुजन चाहे तू नासमझ रहे, ताकि पाठशाला चलती जाए।
तेरी कमजोरी की सीढ़ी से, उसकी विद्या फलती जाए।
मकान मालिक मन ही मन कहे, तू कभी अपना घर न बनाए।
तेरे किराए की हर तारीख़, उसकी जेब में सुख भर लाए।
दाँतों का डॉक्टर मुस्काए, जब दर्द तेरे दाँतों में हो।
तेरी सड़न उसके लिए, रोज़ी-रोटी का संयोग हो।
मकैनिक चाहे गाड़ी रुके, रास्ते में तेरा पहिया थमे।
तेरी परेशानी के पल से ही, उसके औज़ारों के दिन जमे।
कफ़न बेचने वाला सोचे, मौत से उसका व्यापार सजे।
तेरे अंतिम सफ़र की आहट से, उसका भविष्य आगे बढ़े।
हर कोई अपने हित में डूबा, तेरी हालत से लाभ गिने।
तेरी मुश्किल उसका अवसर, तेरी ठोकर उसकी सीढ़ी बने।
पर एक अजीब सा मोड़ भी है, जो सोच को हिला जाता है।
वो है चोर जो दुआ करे, तू चैन से सोता रह जाता है।
वो चाहता है घर में सुख हो, ताकि खिड़की बंद ही रहे।
तेरा जीवन सुरक्षित बीते, ताकि उसे मौक़ा न मिले।
विडंबना है इस जीवन की, कैसा गहरा ये हिसाब।
जो तुझे लूटने निकला था, वही दे जाए सच्चा ख़्वाब।