पलकों की हद लाँघ कर, दामन पे आ गिरा।
एक अश्क मेरे सब्र की, तौहीन कर गया।
बरसों से दिल में जो, तूफ़ान छुपाए बैठा था।
हर दर्द को हँसी की, चादर में ढाँपे बैठा था।
टूटी थीं साँसें भीतर, नींदें भी बिखरी थीं।
फिर भी हर सुबह खुद को, सपनों में जकड़े बैठा था।
हर घाव पे मुस्कान रखी, चेहरा नया बना लिया।
दुनिया को कुछ न दिखे, ऐसा नक़ाब सजा लिया।
मगर उस रोज़ जब तुमने, किसी और का नाम लिया।
नज़रें मेरी आँखों से, चुपके से फेर लिया।
दिल की ऊँची मीनार से, एक ईंट सरक गई।
सालों की मज़बूत ख़ामोशी, अंदर ही दरक गई।
जो अश्क कैद था बरसों से, पलकों की सलाखों में।
आज आज़ाद हो बह निकला, मेरे ही दामन की राहों में।
वो सिर्फ़ एक आँसू न था, ख़ामोशी की चिट्ठी था।
जिसमें लिखा था थक कर—“अब बस… बहुत हो चुका।”
दिल चीखना चाहता था, पर आवाज़ दगा दे गई।
एक कतरा बोल गया सब, सब्र नज़रें छोड़ गया।
लोगों ने पूछा हँसकर—“क्यों उदास हो आजकल?”
मैंने कहा “कुछ नहीं…”, और छुपा लिया फिर हलचल।
सच ये है कि नींद नहीं आती, और आए तो ख़्वाब तुम्हारे।
हर रात वही कहानी, वही अधूरे इशारे।
वो एक अश्क अब रोज़, पलकों पे दस्तक देता है।
याद दिलाता हर पल— सब्र का भी किनारा होता है।
हर सहने की सीमा होती, हर चुप्पी का स्वर होता है।
जो बाहर आ ही जाता है, जब दिल बहुत बेबस होता है।
अब मैं जान गया हूँ ये, आँसू भी सच कहते हैं।
जब शब्द साथ न दें, तो अश्क बयान करते हैं।
पलकों की हद लाँघ कर जो, दामन पे आ गिरा था।
वो कतरा ही बता गया— सब्र भी कभी थका