सिंहासन खाली करो,
कि जनता अब आती है।
न्याय-अग्नि सी धधकती,
नई वेदी सजाती है।
भूखे पेट भी जिसने,
सपनों को था पाला।
अब जागा है वो जन-मन,
तोड़ चुका है जाला।
आँसू अब अंगार हुए,
सवाल बने तलवार।
झूठ की चादर फट जाएगी,
सच की होगी बौछार।
महलों में बैठे सुन लें,
नक़ाब नहीं बच पाएगा।
हर गद्दार और जालिम का,
चेहरा सामने आएगा।
ये भीड़ नहीं जनसागर है,
जिसे न रोके दीवार।
धर्म-जाति सब हारेंगे,
जीतेगा जन-विचार।
रोटी का जो हक छीना,
वो अब लौटाया जाएगा।
हर अन्याय का हिसाब,
ब्याज समेत चुकाया जाएगा।
हर नारे में आग जगी,
हर कदम नई मिसाल।
सिंहासन खाली करो,
आया जनता का काल।