हे रम-प्रेमी ग़ालिब के भाई,
हाथों में तेरे जाम की मलाई।
साक़ी से गिलास भरवाया तूने,
पर दिल का हाल कब समझाया तूने?
महफ़िल में शेर सुनाता रहा,
दर्द भी अपना ही पिलाता रहा।
जाम कितना था, ये बात नहीं,
दिल में छुपी थी लाचारी कहीं।
शौक़ में खुद को मत जला,
नशे में अपना घर मत जला।
जिंदगी में भी रंग सजा,
हर खुशी को दिल से रचा।
नदी-नालों की हूरें झूठी,
ख़्वाबों की दुनिया बहुत ही रूठी।
जो शबाब दे, वो शबख़ून करे,
जो जाम दे, ज़हर भी भरे।
साक़ी की बातों में मत आ,
अपनी राहों को मत भुला।
पैमाना बस उतना ही ले,
होश रहे, दुनिया भी दिखे।
जश्न रहे पर ज़मीर भी साथ,
निगाहों में सच्चाई की बात।
धुएँ में सच को मत जलाना,
लफ़्ज़ों से रोशनी जगाना।
ग़ालिब के हमदर्द शायर तू,
कलम भी है तेरे हाथ में यूँ।
कभी जाम रख, कभी कलम उठा,
अपनी पहचान को यूँ न मिटा।
हद में रख जाम की रवानी,
वरना खो जाएगी कहानी।
जो दिल से निकली सच्ची बात,
डूब न जाए नशे की रात।