हम हैं कान…
जी हाँ वही, दो अनजान।
चुपचाप सब कुछ सुनते हैं,
पर खुद कभी न सुने जाते हैं।
हम दो हैं जुड़वां भाई,
लेफ्टू-राइटू नाम रखाई।
किस्मत ने ऐसा खेल रचा,
एक-दूजे को न देख सका।
पैदा होते ही श्राप मिला,
उल्टी दिशा में टंगा किला।
Zoom मीटिंग भी न हो पाई,
ज़िंदगी भर दूरी निभाई।
हमें मिला बस सुनने का काम,
ऑडियो रिकॉर्डर सुबह-शाम।
गालियाँ हों या मीठी बात,
सब दर्ज है दिन और रात।
धीरे-धीरे खूंटी समझे गए,
चश्मे-मास्क हम पर टंगे।
एयरफोन ठूसे, बाल कटे,
दर्द हमारे हिस्से पड़े।
अरे चश्मा आँखों के लिए है,
फिर हम पर क्यों लटकाए है?
हम कोई हैंगर थोड़े हैं,
जो बोझ सभी का ढोते हैं।
बचपन में टीचर झिंझोड़े,
“कान खींच दूँगा!” शब्द छोड़े।
जैसे खींचने से बुद्धि जागे,
हम ही हर सज़ा को भोगे।
जवानी आई, छेद हुए,
झुमके-बालियाँ हम पर सजे।
बोरवेल हमने झेला भाई,
तारीफ चेहरे ने पाई।
कानों के लिए न क्रीम कोई,
न कविता में तारीफ होई।
आँखों-होंठों का गुणगान,
हम पर बस कट और तान।
बाल कटाते ब्लेड जो चलती,
हम पर ही वह रेखा जलती।
डिटॉल कहता “शेरू चुप हो”,
दर्द मगर फिर भी न थमो।
अब मास्क युग भी आ गया,
हुक हमारा ही पा गया।
सरकारी खूंटी समझ लिया,
हर बोझ हमें ही दे दिया।
न रो सकते, न कुछ कह पाते,
बस लटके-लटके मुस्काते।
सब सुन लेते, राज छुपाते,
चुप रहकर भी साथ निभाते।
तो अगली बार जो मास्क लगाओ,
या चश्मा हम पर टिकाओ।
झुमका पहनो, गीत सुनो,
बस “थैंक यू” कहना न भूलो।
हम भी थोड़े सेंसिटिव हैं,
दिल से थोड़े पॉज़िटिव हैं।
हँसते रहो और याद रखो,
कान हैं तो कॉन्फिडेंस रखो।