तपोबल से धरती पर होते शूर महान,
‘जाति-जाति’ का शोर मचाएँ कायर और अज्ञान।
धर्म नहीं जो बाँटे मानव ऊँच-नीच के नाम,
सच्चा धर्म वही जो दे सबको सम सम्मान।
वीर वही जो कर्मठ बन तप में लीन रहे,
जनसेवा के पथ पर चलकर जग में दीन सहे।
वर्ण नहीं है जन्म से तय होने वाला अधिकार,
कर्मों से ही मिलती जग में गौरव की धार।
जो कहे “मैं ब्राह्मण हूँ” पर न तप, न ज्ञान,
वह केवल एक परछाईं है, न उसमें कोई प्राण।
क्षत्रिय वही जो रक्षा करे निर्भय होकर सदा,
न कि केवल नाम का धारी, भीरुता में बँधा।
वैश्य वही जो लोकहित में व्यापार चलाए,
लोभ-मोह से ऊपर उठकर सेवा निभाए।
शूद्र नहीं जो सेवा करे, वह तो पूज्य महान,
नीच वही जो बाँट रहा मानव का सम्मान।
कायरता है जाति गिनाना जब कर्म हों खोखले,
बलशाली वह है जग में जिसके तप हों अनोखे।
उठो युवा! पहचानो खुद को कर्मों की उड़ान,
जातिवाद की जंजीरें तोड़ो, करो नव