कभी था घना, सघन साया,
जहाँ पवन गाए, पंछी आया।
पेड़ों की गोद में जीवन पलता,
हर प्राणी निर्भय होकर चलता।
फिर लोहे ने दस्तक दी एक दिन,
सड़कें उगीं, मशीनों का छिन-छिन।
इंसानी चाहत बढ़ती गई,
हरियाली चुपचाप घटती गई।
ईंटों ने धरती को जकड़ा,
धुएँ ने नभ का गला पकड़ा।
चमकते भवन, शोर बाज़ार,
जंगल का मौन हुआ लाचार।
साल बदले, बदले मौसम,
कभी सूखा, कभी भीषण आलम।
बाढ़ की लहरें सब बहा ले गईं,
प्रगति की नींव भी ढहा ले गईं।
दरकती मिट्टी से अंकुर फूटा,
धरती ने फिर से स्वर को छूटा।
जड़ों की सरसराहट आई,
सोई हरियाली फिर मुस्काई।
जो जंगल चुपचाप गया था,
अब अपना अधिकार कह गया था।
“ये मिट्टी मेरी थी, मेरी रहेगी,
मैं जीवन हूँ—फिर से उगूंगी।”