सदियों पुरानी बातें हैं,
बुजुर्गों की आवाज़ें हैं।
आज भी कानों में गूंजती,
वक़्त की सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती।
अक्सर दादा कहते थे,
धीरे-धीरे समझाते थे—
“नदी के पास घर मत बसाना बेटा,
ये अपना रास्ता कभी नहीं भूलता।”
हम हँसकर टाल दिया करते,
उन शब्दों को हल्का समझते।
कहते—वो पुरानी बात थी,
अब तो दुनिया नई सौगात थी।
अब रिवर-व्यू बिकते हैं,
सपनों जैसे दिखते हैं।
लॉन में झूले, सजी बालकनी,
सेल्फी कॉर्नर, चमकती रवानी।
रेत को सीमेंट से ढक डाला,
पत्थरों को गहना बना डाला।
गूगल मैप से मोड़ मिटाए,
नदी के पथ भी भूल बताए।
नाम रख दिए व्यास-व्यू,
हर दृश्य लगा मानो न्यू।
पर नदी चुपचाप बहती रही,
अपनी स्मृतियों संग रहती रही।
ना वो भूली, ना थकी,
ना कभी अपनी जिद से हटी।
धीरे से कहती घाटी में—
“मैं मालकिन हूँ इस बस्ती की।”
फिर एक दिन बादल गरजे,
आसमान जैसे फटकर बरसे।
घनघोर बारिश ने फाइलें खोलीं,
प्रकृति ने अपनी बातें बोलीं।
नदी आई शांत स्वभाव,
ना क्रोध, ना कोई दाव।
बस धीरे से कहती गई—
“मैं यहीं थी, तुम ही भूले भाई।”
दीवारें टूटीं, छतें बहीं,
आँखों में बस चीखें रहीं।
लोग बोले—सब लुट गया,
किस्मत ने जैसे साथ छोड़ दिया।
सरकार को सबने कोसा,
राजनीति ने मुद्दा रोपा।
पर नदी बस मुस्कराई,
सच की लौ फिर से जगाई।
“मैं तो वही कर रही हूँ,
जो बुजुर्ग कहते रहे सुनो।
मैं मेहमान नहीं इस घाटी की,
मालकिन हूँ हर थाती की।”
अब भी वक़्त है, समझ जाओ,
मुझको दुश्मन मत बनाओ।
मैं जीवन हूँ, मैं धारा हूँ,
हर खेत की मैं सहारा हूँ।
बस इतना सा मान रखो,
मेरा अपना स्थान रखो।
मुझे मत रोको, मत बाँधो,
मेरे प्रवाह को मत आँधो।
अगर सच में सुख पाना हो,
प्रकृति से नाता निभाना हो—
तो याद रखो हर जन-जन,
मैं हूँ धरती की स्पंदन।
मुझे बहने दो, मुझे बहने दो,
मेरे संग जीवन गहने दो।