रोटी जली तो रसोइए ने कहा — “तवा बदल दो।”
बीवी बोली — “ये दहेज का है, इसे बदलना मत बोलो।”
रोटी फिर जली तो आवाज़ आई — “आटा बदल डालो।”
ससुरजी बोले — “ऑर्गेनिक है हमारा, नसीब को ही टालो।”
रोटी तीसरी बार भी काली हो गई,
रसोइए ने कहा — “पानी बदलो, बात सरल हो गई।”
बच्चे बोले — “हम मिनरल वाटर ही पिएँगे,
हमारा पेट VIP है, रिस्क क्यों लिएँगे?”
फिर भी रोटी जली तो बोला — “चूल्हा बदल दो।”
पड़ोसी दौड़े आए — “गैस हमारे नाम है, ये मत छेड़ो।”
धुआँ उठता रहा छत तक काला,
कुत्ता भी सोच में पड़ा — “ये खाना है या ज्वाला?”
दादी ने आखिर समझाया हँसकर,
“या तो शादी बदलो, या रसोइया बदलो खुलकर।”
पर हिम्मत किसी में भी न आई,
हर किसी ने अपनी दलील सुनाई।
रोटी जलती रही, बहाने पकते रहे,
सब अपने-अपने तर्क में सिमटते रहे।
घर में सबको बदलाव चाहिए था,
पर बदलने का साहस किसी में नहीं था।
रसोइया मुस्कुराया और धीरे से बोला,
“यहाँ हर कोई बदलना चाहता है — पर खुद को नहीं तोला।”