मंदिर की घंटी-सी खनकती आवाज़,
पर दिल की तन्हाई में अनकहा सा राज़।
बीवी की हँसी, बच्चों की बात,
फिर भी अधूरा-सा हर दिन की सौगात।
माँ की ममता, पिता की छाया,
बहन-भाई ने हर दर्द सहलाया।
फिर भी मन में उठता है सवाल,
क्या मर्द को भी मिलता है निस्वार्थ ख्याल?
प्यार की राह में नहीं कोई फ्री पास,
हर मुस्कान के पीछे छुपी होती है आस।
बीवी कहे—“प्यार है तो साबित करो,”
बच्चे कहें—“सपनों का घर लाकर भरो।”
बहन पुकारे—“थोड़ा साथ निभाओ,”
पिता कहें—“और आगे बढ़ जाओ।”
माँ की ममता भी चिंता में ढली,
हर दुआ में जिम्मेदारी पली।
मर्द की दुनिया जद्दोजहद की बात,
जहाँ चुप्पी में छिपे रहते हैं जज़्बात।
हर रिश्ता जैसे लेन-देन का हिसाब,
हर अपनापन पूछे कोई जवाब।
दोस्तों की महफिल भी फीकी लगे,
हर मुलाक़ात में मतलब जगे।
सिर पर सपने, हाथ में बही-खाता,
भावनाओं का भी बन गया नाता।
कभी सोचा था प्यार बेमोल होगा,
बिना शर्त, बिना तौल होगा।
पर अब हर एहसास का रेट है तय,
हर मुस्कान के पीछे कोई शर्त नई।
क्यों हर रिश्ते की कीमत आँकी जाती है?
क्यों मोहब्बत भी तोली जाती है?
मर्द भी चाहता है स्नेह का स्पर्श,
बिना कारण कोई दे दिल का हर्ष।
वो भी चाहे कोई यूँ ही मुस्कुराए,
बिना हिसाब उसे गले लगाए।
वो भी थकता है इस दौड़ में रोज़,
चुपके से पोंछे अपने ही ओझल आँसू रोज़।
उसकी खामोशी को कौन पढ़ेगा?
उसके भीतर का दर्द कौन गढ़ेगा?
हर दिन सवालों की बौछार,
“क्यों नहीं बना पाया बड़ा संसार?”
प्यार यहाँ मुफ्त नहीं मिलता,
हर भावना का मूल्य यहाँ सिलता।
पर सच ये भी है गहराई में कहीं,
अब भी बचा है स्नेह सच्चा यहीं।
प्यार कमाया जाता है विश्वास से,
सींचा जाता है धैर्य और एहसास से।
मर्द को भी चाहिए अपनापन,
बस सच्चाई से भरा एक आलिंगन।
ना हो लेन-देन का कोई खेल,
ना हो हर रिश्ते में सौदे का मेल।
मर्द भी चाहता है वही प्यार,
जो मिले दिल से—बिना हिसाब, हर