थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी, ज़रा साँस तो लेने दे,
तेरी भागती दौड़ से निकल, मुझे खुद से मिलने दे।
हर सुबह नई उम्मीदों का दीप जला जाती है,
हर शाम अधूरी-सी थकान थमा जाती है।
तेरे सफ़र में बहुत कुछ पाया है मैंने,
पर दिल अब भी सुकून को तरसता है सपने।
तेरे इम्तिहान रोज़ नए रंग दिखाते हैं,
कभी आँसू, कभी मुस्कान बनकर आते हैं।
इस भीड़ में कहीं खुद को खो दिया है,
अपनी ही तलाश में भटकता-सा हो लिया है।
ऐ ज़िंदगी, ज़रा रुककर तो देख,
मेरे सपनों का कुछ तो बोझ कम कर दे एक।
हर सवाल का कोई जवाब तो मिले,
दिल की उलझनें भी आज साफ़ हो चलें।
कभी तो सन्नाटा भी सुनने दे मुझे,
कभी तो खुदा से जुड़ने दे मुझे।
कभी आईने में सच मेरा दिख जाए,
कभी अपना ही चेहरा अपना लग जाए।
तेरे संघर्षों ने हिम्मत सिखाई है,
हर ठोकर ने नई राह दिखाई है।
पर अब एक लम्हा चैन का भी चाहिए,
जहाँ दर्द नहीं, बस सुकून का साया हो।
थोड़ा ठहर जा ऐ ज़िंदगी, तेरी रफ़्तार बहुत तेज़ है,
मेरे अरमान अभी अधूरे हैं, सफ़र के कुछ राज़ अभी शेष हैं।