अभी रूबरू भी नहीं हुआ हूँ मैं, ऐ ज़िंदगी, तुझसे पूरी तरह,
आपाधापी की आंधी में तेरा चेहरा खोजता रहा हर पहर।
अंधी दौड़ में तेरे असली लुत्फ़ को टटोलता रहा,
तू सामने होकर भी जैसे ओझल-सी रही सदा।
लोग कहते थे—तू अनमोल सफ़र है,
जिसमें ठहराव भी गीत है और रफ़्तार भी सुर है।
मैंने धरती से पाताल तलक तुझे ढूँढा,
पर सुकून का नखलिस्तान कहीं न मिला।
अब समझ आया, ‘ठहर’ ही वो मंत्र था,
जो जीने का सलीका चुपचाप कहता था।
पर पैरों को आदत है भागते जाने की,
दिल को ज़िद है हर पल कुछ पाने की।
रफ़्तार की हवाओं ने महक छीन ली ठहराव की,
थका दिया है इस अंधी चाह ने प्रभाव की।
चलो अब थोड़ा मद्धिम हो लेते हैं,
तेज़ कदमों से कुछ पल को मुक्त हो लेते हैं।
ढूँढते हैं वो कोना जहाँ रूह को आराम मिले,
जहाँ हर साँस में अपनापन खिले।
वहीं के गिर्द अपना आशियाना बना लें,
खामोशियों संग जीने का बहाना बना लें।
आह से अहा तक का ये सफ़र,
अब तेरे संग मुस्कुराकर तय कर लें।
जो भी लम्हा बाकी है जीवन में,
तेरी बाहों में सुकून ढूँढते हुए जी