सन्नाटे में धड़कनों की धुन बना लेते हैं,
टूटे सपनों की राख से उजाला सजा लेते हैं।
बुझी उम्मीदों की चिंगारी समेटकर,
हम फिर से परचम हवा में लहरा लेते हैं।
आना ज़िंदगी, ओ मेरी ज़िंदगी,
सूखी साँसों में थोड़ी नमी भर दो।
बिखरे रास्तों की वीरान धूल पर,
किसी चिराग़ की हल्की-सी लौ धर दो।
मेरे घर आना…
वो घर जो ईंट-पत्थर से नहीं बना,
मोहब्बत की मिट्टी से रचा गया है।
जहाँ हर कोना दुआओं से सजा गया है।
जहाँ दीवारें इंतज़ार में खड़ी रहती हैं,
और खामोशियाँ भी बातें कहती हैं।
उस घर का छोटा-सा बस इतना पता है,
नक्शे में दर्ज नहीं, दिलों में बसा है।
दिल की गलियों से होकर गुजरना,
तन्हाई की चौखट पर ज़रा ठहरना।
मेरे घर के आगे “मोहब्बत” लिखा है,
वो शब्द जो कभी नहीं मिटा है।
न बारिश उसे धुंधला कर पाती है,
न आँधी उसे गिरा पाती है।
वक़्त की धूल भी हार मान जाती है,
उसकी इबारत अमर हो जाती है।
मेरे घर की दीवारें गुम-सी हैं,
और छत भी कहीं धुंधली-सी है।
खुला है आसमान का हर टुकड़ा यहाँ,
सितारों की चादर ओढ़ लेता हूँ जहाँ।
चाँद को दिया बनाकर रख देता हूँ,
रात की पेशानी पर सजा देता हूँ।
मेरे घर का कोई दरवाज़ा नहीं,
न ताले हैं, न कोई चौखट कहीं।
तुम्हारी चाहत ही मेरी दस्तक बने,
तुम्हारा नाम ही मेरी चाबी बने।
तुम्हारा होना ही मेरी हिफाज़त हो,
तुम्हारी आहट ही मेरी राहत हो।
आना ज़िंदगी, ओ मेरी ज़िंदगी,
क्योंकि बिन तेरे ये ठिकाना अधूरा है।
तेरे बिना हर सुर बेसुरा है,
हर रंग फीका, हर मौसम सूना है।
तू आएगी तो हवाओं में गुनगुनाहट होगी,
सन्नाटे में भी सरगम की आहट होगी।
अभी तो हम गीत यूँ ही गा लेते हैं,
टूटे तारों से स्वर मिला लेते हैं।
पर सच ये है कि तेरे बिन सब अधूरा है,
हर उजाला थोड़ा-सा धुँधला है।
तू आएगी तो रौशनी मुकम्मल होगी,
हर धड़कन में नई हलचल होगी।
मेरे घर की साँसें तेरा इंतज़ार करती हैं,
हर आहट पर तेरी पुकार करती हैं।
आ जा कि ये वीराना घर बन जाए,
तेरे संग हर दर्द सफर बन जाए।
मेरे घर आना, ओ ज़िंदगी,
तेरे कदमों से ही ये आँगन खिलेगा।
तू आएगी तो ये सन्नाटा भी,
एक मधुर राग में ढलकर जी लेगा।