निमंत्रण की ज़रूरत नहीं वहाँ जाने को,
न बताने की कि कब लौटकर आने को।
कपड़े कैसे हैं, चेहरा कैसा है, कोई मायने नहीं,
वो घर तो बस आपके आने के लिए ही सही।
दरवाज़ा सदा खुला रहता है वहाँ,
बचपन की महक तैरती है जहाँ।
दो आँखें चौखट पर टिकी रहती हैं,
बस ये सुनने को—कदमों की आहटें सही।
वो घर, जहाँ आप लौटते हैं बिना बताए,
जहाँ थाली बिना माँगे सामने आ जाए।
जहाँ मना करने पर भी प्यार भरी डाँट मिलती है,
हर छोटी ज़िद पर भी हँसी खिलती है।
जहाँ आपकी चुप्पी भी पढ़ ली जाती है,
और हर बात दिल में सहेज ली जाती है।
माँ की नज़र अब भी उतनी ही कोमल है,
उसकी दुआओं में आज भी वही संबल है।
पापा अब भी मजबूत बनने का अभिनय करते हैं,
अपने जज़्बातों को भीतर ही भीतर धरते हैं।
पर उनकी आँखें सब राज़ खोल देती हैं,
जब आपको चौखट पर खड़ा देख लेती हैं।
वो घर सिर्फ दीवारों का नाम नहीं होता,
वो दो धड़कनों का संगम होता।
एक दिन ये दरवाज़े यूँ ही खुले न मिलेंगे,
ये इंतज़ार करते चेहरे भी शायद न दिखेंगे।
तब समझोगे घर का असली अर्थ क्या है,
अपनों के बिना हर कोना कितना सूना सा है।
सारी दौलत, सारे महल फीके लगेंगे,
उनकी एक झलक को तरसते रहेंगे।
एक और आलिंगन की चाह जागेगी,
एक और डाँट दिल को भागेगी।
वो मुस्कान, वो आशीष भरा हाथ,
सब याद आएगा हर एक साथ।
इसलिए अगर आज भी वो घर बुला रहा है,
तो समय को यूँ ही मत गँवा रहा है।
जाइए, गले लगाइए, कुछ पल बिताइए,
पुरानी कहानियाँ फिर से दोहराइए।
माँ की आँखों में चमक भर दीजिए,
पापा के कंधे पर सिर रख दीजिए।
उनके संग हँसिए, कुछ आँसू भी बहाइए,
हर अधूरी बात आज ही कह आइए।
क्योंकि माँ-पापा का घर शाश्वत नहीं होता,
समय का पहिया कभी रुकता नहीं होता।
पर उनका दिया हुआ प्रेम अमर रहता है,
हर सांस में उनका आशीष बसता है।
जब-जब जीवन की राह कठिन हो जाएगी,
उनकी सीख ही राह दिखाएगी।
वो घर भले एक दिन खाली हो जाए,
पर उसका स्नेह सदा मन में समाए।
आज जो इंतज़ार में दरवाज़ा खुला है,
वो प्रेम ही जीवन का असली किला है।
इससे पहले कि समय आगे निकल जाए,
अपने घर की ओर कदम