कागज़ की कश्ती थी, पानी का किनारा था,
न कोई डर था तब, न कोई इशारा था।
हवा की लहरों संग सपने बह जाते थे,
हर बूँद में अपने ही रंग नजर आते थे।
बचपन का दिल कितना आवारा था,
हर कोना जैसे अपना ही सहारा था।
मिट्टी में सजते थे सपनों के महल,
ना कोई चिंता थी, ना कोई पहल।
पेड़ों पे झूलना, बादलों से बातें,
धूप में छुपना, बारिश की सौगातें।
हँसी की गूंज से महकता था आँगन,
सादा था जीवन, और मीठा था स्पंदन।
ना मोबाइल था, ना कोई स्क्रीन,
बस अपनों के संग था हर दिन रंगीन।
छोटी-छोटी बातों में जादू बसता था,
हर दिन नया-सा कोई किस्सा सजता था।
गिरकर भी हँसना हमें आता था,
हर हार में जीत का मज़ा पाता था।
आँसू भी तब मोती बन जाते थे,
दोस्तों के संग सब ग़म भूल जाते थे।
अब आ गए हैं समझदारी के दलदल में,
जहाँ मुस्कान भी तौली जाती है हलचल में।
अब खेल नहीं, बस मंजिल की दौड़ है,
हर चेहरा जैसे जिम्मेदारियों का बोझ है।
ख़ुशी भी भीड़ में कहीं गुम-सी लगती है,
बचपन की मासूमियत अब कम-सी लगती है।
वो नादान पल कितने सुहाने थे,
हर दिन जैसे अपने ही तराने थे।
कागज़ की कश्ती अब नहीं बनती,
वो छोटी-सी नदी पास नहीं बहती।
पर यादों में अब भी लहरें उठती हैं,
मासूम दिनों की तस्वीरें सिमटती हैं।
जब-जब मन थककर बैठ जाता है,
वो बचपन चुपके से पास आ जाता है।
यादों की धूप अब भी चमकती है,
मन की खिड़की से झांकती है।
काश फिर वही दिन लौट आते,
जहाँ दिल से हम दुनिया सजाते।
जहाँ रिश्तों में सच्चाई का नाता था,
हर चेहरा बस अपनापन जताता था।
जहाँ नफरत का कोई किनारा न था,
बस प्यार ही सबसे बड़ा सहारा था।
जहाँ हर सुबह नई कहानी लाती थी,
और हर शाम सुकून सुलाती थी।
अब जीवन की राहें भले बदल गईं,
पर यादों की कश्ती वहीं अटल खड़ी रही।
मन के सागर में अब भी उतारता हूँ,
उन पलों को फिर से जीने का प्रयास करता हूँ।
क्योंकि सच तो वही सुनहरा था,
जब हर सपना अपना और गहरा था।
वो बचपन ही सबसे न्यारा था,
कागज़ की कश्ती थी, पानी का किनारा था।