एक दिन यूँ ही मैंने माँ से पूछा था,
“माँ, क्या तुम अब भी पापा से प्रेम करती हो?”
साठ वर्षों की संगिनी चुपचाप मुस्कुरा उठी,
जैसे जीवन का कोई गहरा सत्य समझा रही हो।
उसकी मुस्कान में शब्दों से अधिक अनुभव था,
मानो प्रेम अब एक शांत और स्थिर स्वर था।
मैं घर लौटकर माँ के शब्दों को सोचने लगा,
प्रेम का अर्थ मन ही मन टटोलने लगा।
उन्होंने लिखा था—
“तुम पूछते हो क्या मैं अब भी उन्हें चाहती हूँ?”
मैं केवल मुस्कुरा देती हूँ, तुम्हारी मूर्खता पर नहीं,
बल्कि इसलिए कि प्रेम अब वैसा नहीं रहा जैसा तुम सोचते हो।
अब प्रेम तितलियों की उड़ान जैसा नहीं है,
न आतिशबाज़ी के शोर और जुनून जैसा है।
अब प्रेम एक जड़ की तरह गहरा और शांत है,
जो तूफानों में भी अडिग विश्वास सा है।
अब दिल तेज़-तेज़ नहीं धड़कता है हर पल,
पर आत्मा को देता है एक गहरा सुकून सरल।
हाथ काँपते नहीं हैं जीवन की थकान से,
पर शक्ति मिलती है हर नए दिन की पहचान से।
अब कोई चौंकाने वाला रोमांच नहीं होता,
बस छोटे-छोटे प्यारे अनुष्ठान साथ होते हैं।
एक ही समय की कॉफी का इंतज़ार रहता है,
तौलिया टाँगने पर बहस का सिलसिला चलता है।
जब छींक आती है तो वह चुपचाप पास आता है,
रजाई खींचकर मेरे ऊपर प्यार से डाल जाता है।
फूलों की प्रतीक्षा अब उतनी जरूरी नहीं लगती,
न ही पत्रों की आस मन को उतनी खलती।
जब पीठ दर्द करे तो उसका सहारा चाहिए होता है,
जब मन भीतर से थककर बिखरने लगता है।
वह बिना शोर के बस मौजूद रहता है सदा,
बिना किसी फ़िल्मी वादे के निभाता है वफ़ा।
उसकी एक दृष्टि ही मेरी भाषा समझ जाती है,
साथ बिताया जीवन गुप्त कहानी बन जाती है।
हँसना, थकना और फिर भी साथ चलते जाना,
यही प्रेम का असली अर्थ धीरे-धीरे जाना।
तो क्या मैं अब भी प्रेम में हूँ?
हाँ, पर उस हलचल वाले प्रेम में नहीं।
मैं उस शांति में हूँ जिसे हमने साथ गढ़ा है,
उस विश्वास में हूँ जिसने हमें जोड़ रखा है।
तूफानों में भी वह मेरा सुरक्षित ठिकाना है,
मेरे जीवन का सबसे सुंदर आश्रय पुराना है।
प्रेम अब शब्द नहीं, एक मौन सहमति है,
साथ रहने की एक गहरी आत्मीय प्रतिबद्धता है।
आरंभ की आग अब धीमी रोशनी बन गई है,
जीवन की सच्ची कहानी वहीं कहीं रुक गई है।
मैं अब भी प्रेम में हूँ,
पर उस प्रेम में जो समय के साथ मजबूत हुआ है।