जीवन-रण में जब मैं अकेला-सा खड़ा रह जाता हूँ,
हे केशव, तुम ही मेरा कवच बनकर आ जाते हो।
अर्जुन-सा जब मन युद्ध की थकान से भर जाता है,
तब तुम्हारा नाम ही भीतर साहस जगा जाता है।
जब राहें धुंधली-सी लगने लगती हैं जीवन में,
और भीतर का दीपक भी बुझने लगता है मन में,
तब तुम कहीं से एक किरण बनकर आ जाते हो,
हाथों में साहस रखकर आगे बढ़ना सिखलाते हो।
कठिन संकट हो या पीड़ा का भारी अंधकार,
मेरी डगमगाती दृष्टि को तुम देते हो आधार।
तुम रथ के सारथी बन मार्ग दिखाते जाते हो,
मुझे हर मुश्किल से लड़ना भी सिखाते जाते हो।
क्या महंगा क्या सस्ता, अब कोई चिंता नहीं रहती,
मेरा भाग्य और विश्वास तुम्हीं तो बनाते रहते।
दुनिया के हिसाब में हार और जीत बदलती रहती है,
पर तुम कर्म को ही सच्ची साधना कहते रहते।
जब मन अपने ही बुने जालों में उलझ जाता है,
तब तुम्हारा धैर्य मन को फिर राह दिखाता है।
तुम धैर्य का मधुर संगीत मन में बजा देते हो,
जीवन को फिर से सही लय में बाँध देते हो।
गोपियों के प्रिय और अर्जुन के सच्चे सारथी तुम,
द्वारका के राजा और वृंदावन के कान्हा तुम।
कहीं भी रहो, मेरे हृदय में मित्र रूप बसे हो,
मेरे विश्वास और प्रेम के सबसे सुंदर अंश हो।
जैसा हूँ, वैसे ही मुझे स्वीकार तुम्हीं करते हो,
बिना किसी शर्त के सदा प्रेम तुम्हीं करते हो।
न कोई माँग, न कोई सौदा, न कोई हिसाब यहाँ,
सहज निर्मल अपनापन ही तुम्हारा स्वर यहाँ।
तुम्हारे चरणों में रखी मेरी थकान और व्यथा,
अहंकार और पीड़ा सब हो जाती है लुप्त सदा।
मेरे मन की हर गाँठ को तुम खोल दिया करते हो,
मुझको गंधर्व-शक्ति का रूप दिया करते हो।
हे वंशीवट के वासुदेव मेरी आँखें खोल देना,
हर परिस्थिति में तुम्हारा संकेत मुझे देना।
मेरे मन को वह शांति देना गीता के ज्ञान जैसी,
अडिग रहे मेरी आत्मा पर्वत के मान जैसी।
मेरे कर्मों में पवित्रता का दीप जला देना,
संसार में अपनी गंध का प्रकाश फैला देना।
हे माधव, हे श्यामसुंदर, बस इतना वर देना,
मुझे सदा अपने चरणों का आश्रय देना।