26. जब तुम आगे बढ़ते हो

जब तुम जीवन में आगे बढ़ने लगते हो,
कुछ लोग भीतर ही भीतर डरने लगते हैं।


तुम्हारी उड़ान उन्हें असुरक्षित-सी लगती है,
क्योंकि सच्चाई उनकी छिपी हुई परतें खोल देती है।


तुम्हारी ईमानदारी किसी के भ्रम को तोड़ देती है,
तुम्हारी सीमाएँ उनकी आदतों से जा टकराती हैं।


तुम्हारा साहस उनके भीतर के डर को जगा देता है,
और तुम्हारी रोशनी अंधेरों को सामने ला देता है।


वे तुमसे नहीं, अपने ही दर्द से लड़ते रहते हैं,
पर तुम्हें देखकर अपने सच से डरते रहते हैं।


तुम केवल एक ऐसा आईना बन जाते हो,
जिसमें उन्हें अपना ही अक्स नजर आता हो।


कभी-कभी नफरत असली नफरत नहीं हुआ करती,
वह अधूरी कहानियों का दर्द बनकर छुपी रहती।


शब्दों में जो कहा नहीं जा सका, वही दर्द होता है,
जो भीतर ही भीतर चुपचाप रोता रहता है।


इसलिए जब लोग दूर होने लगते हैं या बदल जाते हैं,
और अपने व्यवहार से धीरे-धीरे ठंडे पड़ जाते हैं।


खुद से कभी यह सवाल मत करते रहना,
“मैंने क्या गलत किया?” सोचकर मत घबराना।


धीरे से मन को समझाना और यह जान लेना,
“मैंने शायद उन्हें अपना असली रूप दिखा दिया।”


याद रखना—सच की रोशनी कभी अपराध नहीं होती,
और सच्चाई से बढ़कर कोई पहचान नहीं होती।

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Rajeev Verma

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