तुलना की नजर जब मन के भीतर छा जाती है,
अंदर की रोशनी धीरे-धीरे बुझती जाती है।
दूसरों की ऊँचाइयों को बस देखते ही रह जाते हैं,
अपनी ही पहचान को कहीं पीछे छोड़ आते हैं।
ईर्ष्या का बीज कोई और बाहर नहीं बोता है,
हम ही अपने हाथों उसे मन में सींचते होता है।
दूसरों की खुशियों में भी कमी खोजते रहते हैं,
अपने हृदय की धरती को बंजर करते रहते हैं।
तुलना का खेल बहुत ही ज्यादा खतरनाक होता है,
यह जीत से पहले ही हार का स्वाद चखवाता है।
जो खुद को दूसरों के तराजू में तौलता रहता है,
वह धीरे-धीरे अपना मूल्य खोता जाता है।
ईर्ष्या मन की शक्ति को कमजोर बना देती है,
व्यक्ति की उड़ान को सीमित कर देती है।
दूसरों की चमक देखकर दुखी नहीं होना चाहिए,
अपनी ही रोशनी पर भरोसा करना चाहिए।
हर इंसान का जीवन और सफर अलग होता है,
हर मंज़िल का रास्ता भी अलग-अलग होता है।
तुलना से न कोई आगे बढ़ पाया है कभी,
न तुलना से किसी को सच्ची खुशी मिली है।
अगर जीतना है तो खुद से जीतते जाना होगा,
अगर बढ़ना है तो खुद को ही सुधारना होगा।
ईर्ष्या के अंधकार में जीवन मत बिताना,
अपनी खूबियों की रोशनी में चमकते जाना।
तुलना छोड़ देने से मन विशाल बन जाता है,
ईर्ष्या छोड़ देने से इंसान महान बन जाता है।
जो अपनी राह पर सच्चाई से चलता जाता है,
वही जीवन में सबसे ऊँचा स्थान पाता है।