क्षमा एक कोमल फूल है, जिसमें प्रेम की छाया रहती है,
शीतल-सी उसकी महक हर मन को अपना बना लेती है।
दुनिया चाहे उसे रौंद दे या ठुकराकर दूर करे,
फिर भी उसकी सुगंध समय के साथ चुपचाप बिखरे।
दुःख की धूल भी जिस फूल पर धीरे से गिर जाती है,
वह और भी ज्यादा सुंदर और सुगंधित बन जाती है।
जीवन से जिसको चोट मिले, वह और दिव्य हो जाता है,
पीड़ा सहकर भी मन का सौंदर्य बढ़ता जाता है।
क्रोध भीतर ही भीतर जलकर अंधकार फैलाता है,
द्वेष का साया धीरे-धीरे जीवन को भर जाता है।
पर क्षमा का छोटा-सा दीप यदि मन में जल जाए,
हर पीड़ा, हर अंधकार उसी पल दूर हो जाए।
जिस मन में क्षमा की निर्मल धारा बहती रहती है,
वहाँ कलुष और द्वेष की छाया कभी नहीं ठहरती है।
जहाँ प्रेम की उजली ज्योति हृदय में जग जाती है,
वहाँ अंधियारी रात भी धीरे-धीरे ढल जाती है।
जो मन क्षमा को सच्चे भाव से अपना लेता है,
वह स्वयं ही प्रकाश का सुंदर रूप बन जाता है।
कुचले हुए फूलों जैसी उसकी सुगंध फैलती जाती है,
दूर-दूर तक प्रेम और शांति का संदेश पहुँचाती है।
जीवन का सबसे सुंदर सत्य प्रेम का प्रवाह है,
क्षमा ही संसार में सबसे मधुर और पावन चाह है।
क्षमा वह सुगंध है जो मन को निर्मल कर देती है,
मानवता के मार्ग पर नई रोशनी भर देती है।