जब दीपक की लौ भी थककर धीमी पड़ जाती है,
और सड़कों की खामोशी रात में उतर आती है।
तब वह भारी कदमों से दरवाज़ा खोलता है,
दिनभर की थकान को चुपचाप साथ टटोलता है।
दिन भर उसने सूरज से अपने हिस्से की जंग लड़ी,
पसीने और खामोशी के संग हर मुश्किल से लड़ाई करी।
सपनों को अपनी जेब में मोड़कर रख लेता है,
जो सपने थे भी नहीं, फिर भी उनको सँभाल लेता है।
घर तब तक उसके आने तक सो चुका होता है,
परदे गिर जाते हैं, सन्नाटा ही रह जाता है।
मेज़ पर रखी ठंडी रोटियाँ उसका इंतज़ार करती हैं,
बिना किसी शिकायत के चुपचाप खड़ी रहती हैं।
वे रोटियाँ सिर्फ आटे और आग से नहीं बनी होतीं,
उनमें उसके पसीने और दर्द की कहानी छुपी होती।
हर कौर में दबा हुआ संघर्ष का एक साया रहता है,
होंठों पर उसकी मजबूरी का मौन ठहरा रहता है।
दिनभर की बात कोई उससे पूछने वाला नहीं होता,
उसके दिल का दर्द भी किसी से कहा नहीं जाता।
दिल अब खामोशी की भाषा को समझने लगा है,
जैसे मिट्टी के नीचे कोई बीज सोने लगा है।
पास के कमरे में बच्चे मीठे सपने बुनते रहते हैं,
उनकी हँसी के पीछे किसी के त्याग छुपे रहते हैं।
थकी आँखों और अधूरी नींदों की कीमत किसने जानी,
उनकी खुशियाँ खरीदी गईं किसी की कुर्बानी से मानी।
वह ठंडी रोटियों से कभी शिकायत नहीं करता है,
त्याग की भाषा को अब वह भलीभाँति समझता है।
हर दिन जीवन उसे सहने का पाठ सिखाता है,
कि असली गर्माहट मन के भीतर से ही आता है।
दुनिया तालियाँ उन्हीं के लिए बजाया करती है,
जो ऊँचे स्वर में अपनी पहचान दिखाया करती है।
पर ईश्वर हर खामोश दर्द और त्याग को जानता है,
हर निभाए हुए वादे का मूल्य वही पहचानता है।
रोटियाँ ठंडी ही सही, भूख भी कुछ पल ठहर जाए,
प्रेम की भाषा हर पीड़ा से आगे निकल जाए।
शायद किसी दिन चूल्हा फिर उसके लिए भी जलेगा,
किसी की आँखों में इंतज़ार का सूरज भी खिलेगा।
तब तक वह शांति से वही रोटी खाता रहेगा,
जिसमें किसी प्रेम का मौन आशीर्वाद समाया रहेगा।