तकलीफ़ें तो जैसे वाई-फाई की तरह होती हैं,
आज जुड़ीं, कल अपने आप ही खोती हैं।
दो-चार रिस्टार्ट में ग़म भी पुराना हो जाता है,
ज़िंदगी का सफ़र फिर से सुहाना हो जाता है।
मगर जो जानबूझकर दिल पर चोट लगाता है,
वो पॉप-अप ऐड की तरह पीछा नहीं छोड़ पाता है।
क्रॉस का बटन दबाओ तो भी लौटकर आता है,
“अभी कहाँ गए? मैं फिर आऊँ?” यही दोहराता है।
कुछ लोग मौसम से भी तेज़ बदल जाते हैं,
सुबह कुछ और, दोपहर कुछ और रंग दिखाते हैं।
पूछो तो कहते हैं— “मैं ऐसा ही स्वभाव रखता हूँ”,
जैसे बदलना उनकी कोई खास पहचान रखता हूँ।
ऐसे इंसान पर भरोसा करना मुश्किल काम है,
जैसे चाय में नमक डालना, हर घूँट में गुमनाम है।
हर घूँट पर दिल यही सवाल दोहराएगा,
क्या ये मेरी गलती थी या वक्त ही सताएगा।
जिनकी फितरत ही बदलने की राह चुनती है,
उनकी दोस्ती भी ज्यादा देर कहाँ टिकती है।
न उनके वादे लंबे चलते, न रिश्ते मजबूत रहते हैं,
ऐसे लोग बस अपने ही रंग में खोए रहते हैं।
समय बदलता है, यह सच हर किसी ने जाना है,
पर इंसान का बदलना भी एक सीख भरा बहाना है।
जो हर पल अपना रंग बदले, उस पर भरोसा न करो,
ऐसे लोगों से जीवन में दूरी ही बेहतर भरो।