उन्होंने सिर्फ ऊँचे मकानों की चमक देखी है,
दीवारों के पीछे छुपी बेचैनी कभी नहीं देखी है।
महलों की खामोश रातों का अँधेरा समझा नहीं,
रौशनी में बंद उम्मीदों की आहट सुनी नहीं।
हमने हर सपने को टूटकर बिखरते देखा है,
आँखों के समंदर में खामोशी को बहते देखा है।
चाहत के शहर में जलते हुए अरमान भी जाने हैं,
दिल के कोनों में छुपे दर्द के अफ़साने पहचाने हैं।
वो खुशियों की नरम धूप में चलते रहे सदा,
आसान रास्तों पर ही बढ़ते रहे सदा।
हमने काँटों भरी राहों में मुस्कुराना सीखा है,
गिरकर भी हर बार फिर से उठ जाना सीखा है।
वो हँसी को सिर्फ होंठों की सजावट समझते रहे,
हम आँखों की नमी में भी कहानी पढ़ते रहे।
राज़-ए-दिल हमने अश्कों की ज़बान में कह दिया,
हर ज़ख़्म को ख़ामोशी का पैग़ाम दे दिया।
उन्होंने ज़िंदगी को बस आसान सा खेल समझा,
हमने हर दर्द को भी अपना मेल समझा।
“राजीव” ने शब्दों में अपने दर्द को ढाल दिया,
शायरी के आईने में सच्चाई को संभाल दिया।
दिल की दुनिया को उन्होंने कभी महसूस नहीं किया,
अल्फ़ाज़ों में छिपे सच को भी देखा नहीं किया।