एक वरिष्ठ अधिकारी लंबे और सफल कार्यकाल के बाद सेवानिवृत्त हुआ। वर्षों तक वह भव्य सरकारी आवास में रहा था, जहाँ सुविधाएँ, स्टाफ और सम्मान हर समय उसके साथ रहते थे। सेवानिवृत्ति के बाद वह अपनी ही एक फ्लैट वाली हाउसिंग सोसायटी में आकर रहने लगा।
लेकिन जगह बदलने के बाद भी उसका स्वभाव नहीं बदला। वह खुद को अब भी “बड़ा आदमी” मानता था। सोसायटी में वह किसी से बात नहीं करता, किसी को महत्व नहीं देता। हर शाम वह पार्क में टहलने आता, पर दूसरों की तरफ देखता भी नहीं। यदि कोई नमस्ते करता, तो वह या तो अनसुना कर देता या फिर ऐसे देखता जैसे सामने वाला उसके स्तर का ही नहीं है।
एक दिन पार्क में वह बेंच पर बैठा था। उसके पास एक बुजुर्ग सज्जन भी बैठे थे। उन्होंने सहजता से बातचीत शुरू कर दी। आश्चर्य की बात यह थी कि अधिकारी ने जवाब दे दिया। उस दिन के बाद दोनों की मुलाकातें नियमित होने लगीं।
पर उनकी बातचीत वास्तव में बातचीत नहीं थी। अधिकतर समय वह अधिकारी ही बोलता रहता। वह अपने पुराने पद, रुतबे, अधिकार और सम्मान की कहानियाँ सुनाता रहता।
वह बार-बार कहता,
“आप लोग क्या जानें मैंने कितने बड़े पद पर काम किया है।
मेरे पास कितनी ताकत थी, कितना प्रभाव था।
मैं यहाँ मजबूरी में रहने आया हूँ।”
बुजुर्ग व्यक्ति शांत होकर उसकी बातें सुनते रहते। वे न तो तारीफ करते, न विरोध। बस मुस्कुराकर सुनते।
कई दिनों बाद एक शाम अधिकारी को अचानक जिज्ञासा हुई। उसने पूछा, “अच्छा, आप बताइए… आप क्या थे? आपने क्या काम किया है?”
बुजुर्ग व्यक्ति हल्के से मुस्कराए और बोले,
“सेवानिवृत्ति के बाद हम सब फ्यूज़ बल्ब जैसे हो जाते हैं। बल्ब कितने वॉट का था, कितना चमकता था, कितनी रोशनी देता था—अब कोई फर्क नहीं पड़ता, जब वह फ्यूज़ हो जाए।”
अधिकारी चौंक गया। बुजुर्ग ने आगे कहा,
“मैं इस सोसायटी में पाँच साल से रह रहा हूँ। मैंने किसी को नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य (MP) रह चुका हूँ। उधर दाईं तरफ जो वर्माजी हैं, वे भारतीय रेल में जनरल मैनेजर थे। उधर जो सिंह साहब टहल रहे हैं, वे सेना में मेजर जनरल रहे हैं। और वह जो बिल्कुल सफेद कपड़ों में बेंच पर बैठे हैं, वे मेहराजी हैं—जो कभी ISRO के प्रमुख थे। उन्होंने यह बात किसी को नहीं बताई, मुझे भी नहीं, लेकिन मैं जानता हूँ।”
फिर वे बोले,
“अब यहाँ सभी फ्यूज़ बल्ब एक जैसे हैं—चाहे 0 वॉट, 10 वॉट, 40 वॉट, 60 वॉट या 100 वॉट। यह भी मायने नहीं रखता कि बल्ब LED था, CFL था, हलोजन था या सजावटी। फ्यूज़ होने के बाद सब बराबर हैं। और मेरे मित्र, यह बात आप पर भी लागू होती है। जिस दिन आप यह समझ जाएंगे, उसी दिन आपको इस सोसायटी में भी शांति और सुकून मिल जाएगा।”
उन्होंने आगे कहा,
“उगता सूरज और ढलता सूरज—दोनों सुंदर होते हैं। लेकिन सच यह है कि उगते सूरज को ज्यादा सम्मान मिलता है, पूजा भी होती है, जबकि ढलते सूरज को वही आदर नहीं मिलता। इस सच्चाई को जितनी जल्दी समझ लें, उतना अच्छा।”
हमारे पद, उपाधि और शक्ति स्थायी नहीं होते। इनसे अत्यधिक भावनात्मक जुड़ाव जीवन को जटिल बना देता है, खासकर उस दिन जब ये सब छिन जाते हैं।
याद रखिए—जब शतरंज का खेल खत्म होता है, तो राजा और प्यादा दोनों एक ही डिब्बे में वापस चले जाते हैं।
इसलिए जो आज आपके पास है, उसे आनंद से जीएँ। विनम्र रहें, शांत रहें और आने वाले समय को सुंदर बनाइए।