लघु कथा -99

छोटे से शहर नीलपुर में अर्जुन नाम का युवक रहता था। उसका स्वभाव इतना सरल और सीधा था कि लोग कहते थे—“अर्जुन तो मिट्टी जैसा है, जैसा चाहो वैसा ढाल लो।” वह हर किसी की बात मान लेता, बिना ना कहे, बिना सवाल किए।
पड़ोस में रहने वाला विक्रम चतुर था। वह जानता था कि अर्जुन कभी मना नहीं करेगा। कभी पैसे उधार लेने हों, कभी काम टालना हो, कभी किसी का बोझ किसी और पर डालना हो—सब अर्जुन पर डाल देता। अर्जुन हर बार सोचता, “कोई बात नहीं, मेरा क्या जाता है।”
ऑफिस में भी यही हाल था। अर्जुन मेहनती था, लेकिन उसका बॉस उसका काम दूसरों के नाम से दिखा देता। अर्जुन चुप रहता। उसे लगता, “मुझे क्या चाहिए, मैं तो अपना काम कर रहा हूँ।”
धीरे-धीरे लोगों को उसकी आदत समझ आ गई। जैसे सूखे कपड़े बिना सोचे बिजली के तार पर डाल दिए जाते हैं, वैसे ही लोग अपनी ज़िम्मेदारियाँ अर्जुन पर टांगने लगे।
एक दिन अर्जुन की माँ बीमार पड़ गई। अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। अर्जुन को पैसों की ज़रूरत थी। वह सबसे पहले विक्रम के पास गया, जिसने उससे कई बार मदद ली थी।
विक्रम ने कहा, “अरे यार, अभी मेरे पास तो कुछ नहीं है, बाद में देखेंगे।” और दरवाज़ा बंद कर लिया।
अर्जुन ऑफिस गया और बॉस से बोला, “सर, मुझे कुछ दिन की छुट्टी चाहिए और अगर हो सके तो मेरी ओवरटाइम की पेमेंट…”
बॉस ने कहा, “अभी कंपनी की हालत ठीक नहीं है, तुम एडजस्ट कर लो, वैसे भी तुम तो समझदार हो।”
अर्जुन पहली बार टूटा। उसे लगा जैसे पूरी ज़िंदगी वह लोगों के लिए तार बना रहा और लोग उस पर अपने-अपने कपड़े सुखाते रहे, लेकिन जब उसे खुद रोशनी चाहिए थी, तब कोई करंट नहीं दिया।
उसी रात वह माँ के पास बैठा था। माँ ने कमजोर आवाज़ में कहा, “बेटा, अच्छे बनो, लेकिन इतने नहीं कि लोग तुम्हें इस्तेमाल करने लगें। जिन तारों में करंट नहीं होता, उन पर ही लोग कपड़े सुखाते हैं।”
ये शब्द अर्जुन के दिल में उतर गए।
अगले दिन से उसने बदलना शुरू किया। जब विक्रम फिर से उधार माँगने आया, अर्जुन ने साफ कहा, “इस बार नहीं, मुझे खुद ज़रूरत है।”
विक्रम चौंका, बोला, “तू भी बदल गया?”
अर्जुन शांत स्वर में बोला, “नहीं, अब मैं खुद को समझने लगा हूँ।”
ऑफिस में जब बॉस ने फिर से उसका काम किसी और के नाम से दिखाया, अर्जुन ने मीटिंग में कहा, “सर, ये प्रोजेक्ट मैंने किया है, और मैं चाहता हूँ कि इसका क्रेडिट मुझे मिले।” कमरे में सन्नाटा छा गया। बॉस को मजबूरन मानना पड़ा।
धीरे-धीरे लोग समझने लगे कि अर्जुन अब वह पुराना तार नहीं है जिस पर कोई भी कपड़े टांग दे। उसमें अब आत्मसम्मान का करंट था।
कुछ लोगों ने उससे दूरी बना ली, क्योंकि उन्हें फायदा नहीं मिल रहा था। लेकिन कुछ नए लोग उसकी ज़िंदगी में आए, जो उसे इंसान की तरह समझते थे, इस्तेमाल की चीज़ की तरह नहीं।
एक दिन अर्जुन ने खुद से कहा, “सरल होना बुरा नहीं, लेकिन इतना सरल होना कि लोग मुझे कुचल दें—यह मेरी गलती थी।”
अब वह वही करता था जो सही और ज़रूरी होता। वह मदद करता, लेकिन अपनी सीमा में।
और पहली बार, उसे लगा कि उसके अंदर सच में रोशनी जल रही है।

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Rajeev Verma

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