लघु कथा -98

गाँव का नाम था नवलपुर। वहाँ रहने वाले शंकरलाल सीधे-सादे और बेहद मददगार इंसान थे। उनका मानना था कि अच्छा किया जाए तो उसका हिसाब भगवान रखता है, इंसान नहीं। इसी सोच के साथ वे बिना किसी अपेक्षा के लोगों की मदद करते रहते थे।
पास ही रहने वाला सुरेश बिल्कुल अलग स्वभाव का था। वह हर बात का हिसाब रखता—किसने क्या दिया, कब दिया, और बदले में क्या मिला। उसकी एक छोटी-सी कॉपी थी, जिसमें वह सब लिखता रहता। लोग मज़ाक में उसे “हिसाबू” कहने लगे थे।
एक दिन गाँव में तेज़ बारिश आई। कई घरों में पानी घुस गया। शंकरलाल ने अपने घर के दरवाज़े सबके लिए खोल दिए। जिस किसी को जगह चाहिए, वह आ सकता था। उन्होंने अपने अनाज का भंडार भी बाँट दिया। किसी से कुछ नहीं पूछा।
सुरेश भी मदद कर रहा था, लेकिन हर किसी से कहता, “देख लेना, मैंने तुम्हें क्या-क्या दिया है।” वह अपनी कॉपी में सब लिख रहा था—तीन किलो चावल, दो कंबल, पाँच सौ रुपये।
कुछ महीने बाद हालात ठीक हुए। लोग अपने काम में लग गए। शंकरलाल फिर से अपनी दिनचर्या में लौट आए, जैसे कुछ हुआ ही न हो। सुरेश इंतज़ार करने लगा कि लोग उसका एहसान चुकाएँ।
एक दिन गाँव की पंचायत बैठी। किसी बात पर चर्चा हो रही थी, तभी सुरेश खड़ा हो गया और बोला, “मैंने बारिश के समय कितनों की मदद की, उसका हिसाब मेरे पास है। अब लोग पूछते हैं—‘तुमने हमारे लिए किया ही क्या है?’ तो मैं सब दिखा सकता हूँ।”
उसने अपनी कॉपी खोलकर नाम पढ़ने शुरू किए। लोग चुप हो गए। कुछ के चेहरे झुक गए, कुछ असहज हो गए। माहौल भारी हो गया।
तभी शंकरलाल उठे और बोले, “सुरेश, तुमने सच में बहुत मदद की, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन अगर मदद का हिसाब किताब में रहेगा, तो वह बोझ बन जाता है, उपकार नहीं।”
सुरेश ने कहा, “लेकिन आजकल लोग जल्दी भूल जाते हैं। कल को कोई पूछे—‘तुमने मेरे लिए किया ही क्या है?’ तो जवाब देने के लिए सबूत तो होना चाहिए।”
शंकरलाल मुस्कराए, “साहब, हिसाब ज़रूर रखा करो, लेकिन दिल में नहीं, काग़ज़ में नहीं—अपने कर्मों में। अगर किसी ने तुम्हारी मदद भूल भी जाए, तो क्या हुआ? तुम्हारा काम तो हो चुका।”
उसी समय भीड़ में से एक बुज़ुर्ग बोले, “शंकरलाल, याद है, मेरे बेटे की शादी में तुमने बिना बुलाए आकर सब संभाल लिया था। तुमने कभी बताया नहीं, लेकिन मैं आज भी नहीं भूला।”
फिर एक महिला बोली, “जब मेरा घर गिरा था, सबसे पहले शंकरलाल ही आए थे।”
धीरे-धीरे कई लोग खड़े होकर शंकरलाल के काम गिनाने लगे। शंकरलाल हैरान हो गए, उन्हें खुद याद नहीं था कि उन्होंने कब क्या किया।
सुरेश चुपचाप अपनी कॉपी बंद करने लगा। उसे समझ आ गया कि जिन रिश्तों में दिल से दिया जाता है, वहाँ हिसाब ज़ुबान पर नहीं आता, लेकिन यादों में अपने आप बस जाता है।
सभा खत्म हुई। बाहर निकलते हुए सुरेश ने शंकरलाल से कहा, “आज समझ आया कि सच्चा हिसाब वही है, जो सामने वाले के दिल में दर्ज हो जाए।”
शंकरलाल ने मुस्कराकर कहा, “और जो दिल में न रहे, वह काग़ज़ पर रहकर भी बेकार होता है।”

Published by

Unknown's avatar

Rajeev Verma

Thanks For watching. Note:- ALL THE IMAGES/PICTURES SHOWN IN THE VIDEO BELONGS TO ME. I AM THE OWNER OF ANY PICTURES SHOWED IN THE VIDEO ! DISCLAIMER: This Channel DOES NOT Promote or encourage Any illegal activities , neither any services of any child is taken in this video making, all contents provided by this Channel is meant for Sharing Knowledge and awareness for health only . Rajeev Verma #HealthyFeasting. I Loves to post videos on Preventive Health Maintenance Food Recipes. Subscribe my YouTube Channel NOW. http://www.youtube.com/c/HealthyFeasting

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.