लघु कथा -97

गुजरात के सौराष्ट्र इलाके के एक छोटे-से कस्बे में केशवभाई रहते थे। लोग उन्हें “केशव काका” कहकर बुलाते थे। उनके चेहरे पर हमेशा सादगी और आँखों में अपनापन झलकता था। केशवभाई भावुक इंसान थे। उनके लिए रिश्ते किसी सौदे की तरह नहीं, बल्कि दिल के धागों से बुनी गई डोर थे।
उनके बचपन का दोस्त था—मनोज। मनोज प्रैक्टिकल किस्म का आदमी था। वह हर रिश्ते को हिसाब-किताब से तौलता। फायदा दिखे तो साथ, नहीं तो दूरी। तीसरा किरदार था—राहुल शाह, एक बड़ा बिजनेसमैन, जो पास के शहर में फैक्ट्री चलाता था। राहुल पूरी तरह प्रोफेशनल था। उसके लिए रिश्ता तभी मायने रखता, जब उससे कोई लाभ हो।
एक साल गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। पानी की किल्लत से किसान परेशान थे। केशवभाई ने अपने घर के पास एक पुराना कुआँ साफ करवाया और सबके लिए खोल दिया। उन्होंने किसी से कुछ नहीं माँगा। जो भी आता, वह प्यार से पानी भरने देता। लोग कहते, “केशव काका दिल के बहुत बड़े हैं।”
मनोज ने यह देखा तो सोचा, “अगर मैं केशव के साथ रहूँ, तो गाँव में मेरी इज्ज़त बढ़ेगी।” वह रोज़ उनके साथ बैठने लगा, लोगों से मिलवाने लगा और धीरे-धीरे अपनी छोटी दुकान के लिए ग्राहक भी वहीं से खींचने लगा। वह रिश्ते का फायदा उठा रहा था, लेकिन ऊपर से दोस्ती दिखा रहा था।
उधर राहुल शाह ने भी यह सब सुना। उसने सोचा, “अगर मैं गाँव में पानी की टंकी बनवाऊँ, तो मेरी कंपनी का नाम चमकेगा, और सरकारी ठेके भी मिल सकते हैं।” वह केशवभाई के पास आया और बोला, “काका, आपके नाम से हम एक बड़ा प्रोजेक्ट करेंगे। आपका नाम होगा, खर्चा मेरा।” केशवभाई खुश हो गए कि गाँव का भला होगा, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि राहुल का असली मकसद सिर्फ फायदा था।
काम शुरू हुआ। टंकी बनी, पानी आया, गाँव खुश हुआ। केशवभाई हर दिन मज़दूरों को अपने हाथ से चाय पिलाते। उन्हें किसी का दुख दिखता तो बिना पूछे मदद कर देते। मनोज अपनी दुकान का प्रचार करता रहा और कमाई बढ़ाता रहा। राहुल अखबारों में अपनी फोटो छपवाता रहा और बड़े अधिकारियों से पहचान बनाता रहा।
कुछ महीनों बाद, राहुल को शहर में बड़ा प्रोजेक्ट मिल गया। उसने गाँव आना बंद कर दिया। टंकी की मरम्मत की ज़िम्मेदारी भी उसने किसी पर नहीं छोड़ी। मनोज की दुकान खूब चलने लगी, लेकिन जब एक दिन केशवभाई बीमार पड़े, तो मनोज ने कहा, “आज दुकान बंद नहीं कर सकता, काका, बहुत भीड़ है।” वह उन्हें अस्पताल तक छोड़ने भी नहीं गया।
गाँव के लोग ही केशवभाई को लेकर गए। इलाज के बाद जब वे लौटे, तो पूरे गाँव ने उनका स्वागत किया। किसी ने कहा, “काका, आपने बिना मतलब के सबका साथ दिया, इसलिए आज सब आपके साथ हैं।”
केशवभाई मुस्कराए और बोले, “भावुक लोग रिश्ते निभाते हैं, प्रैक्टिकल लोग रिश्ते से कमाते हैं, और प्रोफेशनल लोग फायदा देखकर रिश्ता बनाते हैं। पर अंत में साथ वही देते हैं, जिनके दिल में रिश्ता होता है, हिसाब नहीं।”
उस दिन मनोज को अपनी गलती समझ आई और राहुल शाह का नाम लोग धीरे-धीरे भूल गए। लेकिन केशव काका आज भी गाँव के दिल में ज़िंदा हैं—एक सच्चे रिश्ते की तरह।

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Rajeev Verma

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