लघु कथा -95

शहर का नाम था उज्जवलपुर, पर वहाँ रहने वाले बहुत से लोगों की ज़िंदगी उतनी उजली नहीं थी। वहीं रहता था राघव—सीधा, शांत और दिल का साफ इंसान। वह मानता था कि इंसान की असली पहचान उसके काम से होती है, न कि उसकी बातों से।
राघव एक छोटी-सी फैक्ट्री में काम करता था। तनख़्वाह ज़्यादा नहीं थी, लेकिन वह ईमानदारी से काम करता था। एक दिन फैक्ट्री के मालिक ने उससे कहा, “अगर तुम कुछ माल चोरी से बाहर भिजवा दो, तो तुम्हें अच्छी रकम मिलेगी।”
राघव चौंक गया। उसके घर में माँ बीमार थी, दवाइयों के पैसे चाहिए थे। पल भर के लिए उसका मन डगमगाया, लेकिन उसने कहा, “मालिक, मैं ग़लत काम नहीं कर सकता।”
मालिक ने दूसरा आदमी ढूँढ लिया—नाम था विकास। विकास चालाक था, पैसों का भूखा और मौके का फायदा उठाने वाला। उसने तुरंत हाँ कर दी। कुछ ही दिनों में वह ज़्यादा पैसे कमाने लगा। नए कपड़े, नई बाइक, शहर में नाम—सब मिलने लगा।
उधर राघव अपनी पुरानी ज़िंदगी में लगा रहा। माँ की दवा के लिए उसने दोहरी मेहनत शुरू कर दी—दिन में फैक्ट्री, रात को एक गोदाम में मजदूरी। लोग कहते, “इतनी मेहनत क्यों करता है, थोड़ा चालाक बन, तो ज़िंदगी आसान हो जाएगी।”
विकास हँसता और कहता, “देखो, अच्छाई से पेट नहीं भरता, दिमाग से भरता है।”
कुछ महीनों बाद फैक्ट्री में छापा पड़ा। चोरी का माल पकड़ा गया। जाँच शुरू हुई। मालिक ने सारा दोष विकास पर डाल दिया। विकास घबरा गया। जिन दोस्तों के साथ वह शराब पीता था, वे सब गायब हो गए। पैसे भी ज़ब्त हो गए।
विकास को जेल भेज दिया गया। कोर्ट में खड़ा होकर उसने रोते हुए कहा, “मैंने सोचा था कि बुराई का दाम तुरंत मिलता है, लेकिन पता नहीं था कि उसकी कीमत एक दिन पूरी ज़िंदगी से चुकानी पड़ेगी।”
उधर फैक्ट्री को नया मालिक मिला। उसने पुराने रिकॉर्ड देखे और राघव की ईमानदारी से प्रभावित हुआ। उसने राघव को सुपरवाइज़र बना दिया और तनख़्वाह भी बढ़ा दी। गाँव में लोग कहने लगे, “देखो, राघव की अच्छाई रंग लाई।”
एक दिन जेल से छूटकर विकास राघव से मिलने आया। उसका चेहरा थका हुआ था, आँखों में पछतावा। उसने कहा, “राघव, तुम सही थे। अच्छाई की कीमत मिलती है, लेकिन देर से। और बुराई की कीमत चुकानी पड़ती है—और वो बहुत भारी होती है।”
राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा, “अभी भी देर नहीं हुई, विकास। अब से अच्छा करोगे, तो उसका फल ज़रूर मिलेगा।”
विकास ने नया काम शुरू किया—छोटी-सी दुकान। शुरुआत मुश्किल थी, लोग उस पर भरोसा नहीं करते थे। लेकिन वह रोज़ मेहनत करता, सच बोलता, सही तौल देता। धीरे-धीरे लोग लौटने लगे।
कई साल बाद, उज्जवलपुर में दो नाम इज्ज़त से लिए जाते थे—राघव, जिसकी अच्छाई ने उसे ऊँचाई तक पहुँचाया, और विकास, जिसने बुराई की कीमत चुकाकर अच्छाई का रास्ता चुना।
शहर के बुज़ुर्ग अक्सर कहते,
“आदमी की अच्छाई और बुराई—दोनों की कीमत होती है। फर्क बस इतना है कि अच्छाई की कीमत मिलती है, और बुराई की कीमत चुकानी पड़ती है।”

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Rajeev Verma

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