कश्मीर की वादियों में बसा एक छोटा-सा गाँव—पहल्गाम के पास। वहीं रहता था आदिल, बीस साल का नौजवान, जो कविताएँ लिखा करता था। उसकी कविताएँ अजीब थीं—न उनमें साफ़ मतलब होता, न कोई सीधी बात। लोग कहते,
“ये क्या लिखता है? न समझ आता है, न दिल को छूता है। पूरी की पूरी अर्थहीन कविताएँ हैं।”
आदिल को इससे फर्क नहीं पड़ता था। वह कहता,
“जो दिल में है, वही काग़ज़ पर उतरता है। अगर वह उलझा है, तो कविता भी उलझी होगी।”
आदिल के पिता सेब के बाग़ में काम करते थे। माँ घर संभालती थीं। परिवार साधारण था, पर आदिल का मन बहुत उलझा हुआ था। कभी घाटी में शांति होती, कभी डर का साया। कभी स्कूल बंद, कभी दुकानें। उसके भीतर जो भाव थे, वे साफ़ शब्दों में निकल ही नहीं पाते थे।
एक दिन गाँव में एक बूढ़े उस्ताद आए—नाम था हबीब साहब। वे कभी बड़े शायर रह चुके थे। लोग उनके पास सलाह लेने जाते थे। किसी ने आदिल की कविताएँ उन्हें दिखा दीं।
हबीब साहब ने कविताएँ पढ़ीं। फिर आदिल को बुलाया और बोले,
“तेरी कविताएँ सच में अर्थहीन लगती हैं।”
आदिल का सिर झुक गया।
“तो क्या मैं लिखना छोड़ दूँ?”
हबीब साहब मुस्कराए,
“नहीं। सवाल यह नहीं कि कविता में अर्थ है या नहीं। सवाल यह है कि तू क्या कहना चाहता है।”
आदिल बोला,
“मैं खुद नहीं जानता। मेरे भीतर डर है, गुस्सा है, उम्मीद है, सब मिला-जुला है। जब लिखता हूँ, सब टूटे-फूटे शब्द बन जाते हैं।”
हबीब साहब ने कहा,
“जब दिल टूटा होता है, तो भाषा भी टूट जाती है। तेरी कविताएँ अर्थहीन नहीं हैं, वे अधूरी हैं।”
कुछ दिन बाद गाँव में एक घटना हुई। एक छोटी बच्ची, आयशा, अपने पिता को खो बैठी। पूरा गाँव उदास था। आदिल भी चुप था। उस रात उसने एक कविता लिखी—बहुत छोटी, बहुत टूटी हुई:
“घर में चूल्हा है,
पर रोटी रो रही है।”
सुबह उसने यह कविता हबीब साहब को दिखाई। हबीब साहब की आँखें भर आईं।
“बेटा, इसमें बहुत अर्थ है। तूने बस बड़ी बातें छोड़कर सच्ची छोटी बात लिख दी।”
आदिल को पहली बार लगा कि शायद उसकी कविता किसी तक पहुँची है।
धीरे-धीरे वह बदलने लगा। अब वह लिखते समय यह नहीं सोचता था कि कविता बड़ी हो, सुंदर हो या मुश्किल हो। वह बस यह सोचता—जो देखा, जो महसूस किया, वही लिख दूँ।
उसने लिखा—
बर्फ़ पर चलती बूढ़ी माँ के कदम,
स्कूल जाते बच्चे की ठंडी साँस,
बंद दुकान के ताले की खामोशी।
लोग अब भी सब कुछ नहीं समझते थे, पर उन्हें महसूस होने लगा था।
एक दिन किसी ने कहा,
“पहले तेरी कविताएँ अर्थहीन थीं, अब कुछ तो कहती हैं।”
आदिल मुस्कराया,
“पहले मैं खुद अर्थहीन था। अब मैं अपने दर्द को पहचानने लगा हूँ।”
हबीब साहब ने जाते समय कहा,
“कविता का काम समझाना नहीं, महसूस कराना है। जो महसूस करा दे, वह कभी अर्थहीन नहीं होती।”
आदिल अब भी कश्मीर की वादियों में घूमता, लिखता, सोचता। उसकी कविताएँ शायद पूरी तरह साफ़ नहीं थीं, पर अब वे खाली भी नहीं थीं। वे उसी घाटी की तरह थीं—कभी धुंधली, कभी उजली, पर हमेशा ज़िंदा।
वक़्त बीतता गया। हबीब साहब वापस अपने शहर चले गए, पर उनके शब्द आदिल के भीतर रह गए। अब आदिल रोज़ सुबह बाग़ में पिता के साथ काम करता, दोपहर में माँ की मदद करता और शाम को पहाड़ियों पर जाकर बैठ जाता। उसके पास कोई बड़ी डायरी नहीं थी, बस जेब में रखा छोटा-सा काग़ज़ और टूटा हुआ पेन।
कभी वह लिखता—
“पेड़ खड़े हैं, जैसे किसी के इंतज़ार में।”
कभी बस एक पंक्ति—
“आज घाटी चुप है, पर चुप्पी भारी है।”
गाँव के लोग अब उसे अजीब नहीं कहते थे। वे कहते, “ये लड़का अलग है, पर बुरा नहीं।”
एक दिन स्कूल के मास्टर साहब ने उससे कहा, “आदिल, बच्चों को कविता सुनाया कर। किताब की नहीं, अपनी।”
आदिल घबरा गया, “मेरी कविता बच्चे समझेंगे?”
मास्टर साहब बोले, “अगर वे हँसें, चुप हों, या सोच में पड़ जाएँ—तो समझ लेना, समझ गए।”
आदिल पहली बार स्कूल गया। बच्चों के सामने उसने वही कविता पढ़ी—
“घर में चूल्हा है, पर रोटी रो रही है।”
कक्षा एकदम शांत हो गई। फिर एक छोटी बच्ची बोली, “सर, रोटी क्यों रो रही है?”
आदिल ने कहा, “जब घर में कोई नहीं हँसता, तब चीज़ें भी उदास हो जाती हैं।”
बच्ची चुप हो गई। उसकी आँखों में वही उदासी थी, जो कभी आयशा की आँखों में थी। आदिल समझ गया—कविता पहुँच गई।
उस दिन के बाद वह हफ्ते में एक बार स्कूल जाने लगा। बच्चे उसकी कविताएँ कॉपी में लिखते, चित्र बनाते, कुछ अपनी पंक्तियाँ भी जोड़ते। आदिल को लगा—उसकी उलझन अब किसी और की आवाज़ बन रही है।
एक शाम वह नदी के किनारे बैठा था। सूरज डूब रहा था। उसने लिखा—
“डूबता सूरज भी कहता है, मैं हार नहीं रहा, बस आज का काम पूरा कर रहा हूँ।”
उसने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा, “मैं भी हार नहीं रहा हूँ।”
अब उसकी कविताएँ न पूरी तरह साफ़ थीं, न पूरी तरह उलझी। वे इंसान की तरह थीं—थोड़ी टूटी, थोड़ी जुड़ी, थोड़ी डर से भरी, थोड़ी उम्मीद से चमकती।
और कश्मीर की वादियों में, जहाँ हर चीज़ के अपने ज़ख़्म थे, वहाँ आदिल की कविताएँ मरहम नहीं थीं—
पर वे यह ज़रूर कहती थीं कि
दर्द अगर बोला जाए, तो वह अकेला नहीं रहता।