लघु कथा -93

महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर सातारा में गणेश पाटिल रहते थे। बचपन से ही उनके मन में बड़ी-बड़ी इच्छाएँ थीं—बड़ा अफसर बनना, शहर में बंगला खरीदना, लोग उनका नाम आदर से लें। पढ़ाई में वे ठीक थे, पर हालात हमेशा उनके मन के अनुसार नहीं बने। नौकरी मिली, पर साधारण सी। गणेश मन ही मन दुखी रहने लगे। उन्हें लगता था कि जिंदगी ने उनके साथ अन्याय किया है।
घर में बूढ़े माँ-बाप थे, पत्नी सविता और दो छोटे बच्चे। माँ अक्सर बीमार रहतीं। पिता अब चल भी ठीक से नहीं पाते थे। गणेश जब घर आते, तो थके मन से कहते,
“मेरे सपने अधूरे रह गए। जिंदगी में कुछ खास नहीं कर पाया।”
सविता चुपचाप सब सुनती, पर एक दिन बोली,
“तुम्हारे सपने बड़े थे, पर तुम्हारे फर्ज भी तो बड़े हैं।”
गणेश को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्हें लगा कि कोई उनकी पीड़ा नहीं समझता।
एक दिन उनके दफ्तर में एक बुज़ुर्ग अधिकारी सेवानिवृत्त हुए। विदाई समारोह में उन्होंने कहा,
“मैंने बड़े पद नहीं पाए, पर अपने फर्ज निभाए। माता-पिता की सेवा की, बच्चों को अच्छा इंसान बनाया, ईमानदारी से काम किया। आज इसी में मुझे शांति मिलती है।”
यह बात गणेश के दिल में कहीं गूँज गई।
उसी शाम गणेश घर लौटे तो देखा—माँ को तेज बुखार था, पिता उन्हें सहारा देकर बैठा रहे थे। सविता बच्चों को पढ़ा रही थी। गणेश पहली बार ध्यान से यह सब देख रहे थे। उन्हें लगा—ये लोग हर दिन अपना फर्ज निभा रहे हैं, और मैं केवल अपनी अधूरी इच्छाओं का रोना रोता हूँ।
उन्होंने माँ के पास बैठकर कहा,
“आई, आपको दवा दिलवाने ले चलता हूँ।”
माँ ने प्यार से सिर सहलाया,
“बेटा, तू साथ है, यही मेरे लिए काफी है।”
अस्पताल जाते हुए गणेश को अजीब-सी शांति महसूस हुई। उन्हें लगा जैसे दिल का बोझ हल्का हो रहा हो।
अगले दिन उन्होंने बच्चों के साथ समय बिताया। उन्हें कहानी सुनाई, अच्छे-बुरे का फर्क समझाया। बच्चे खुश होकर बोले,
“बाबा, आप रोज हमारे साथ बैठा करो।”
गणेश के चेहरे पर पहली बार सच्ची मुस्कान आई।
कुछ दिनों बाद उन्होंने अपने पिता से कहा,
“बाबा, अब मैं रोज सुबह आपके साथ टहलने चलूँगा।”
पिता की आँखें भर आईं,
“बेटा, तेरी यह बात सुनकर ही मेरा मन खुश हो गया।”
धीरे-धीरे गणेश का नजरिया बदलने लगा। अब वे यह नहीं सोचते थे कि उन्हें क्या नहीं मिला। वे यह देखते थे कि वे क्या कर सकते हैं—माँ-बाप की सेवा, बच्चों को अच्छे संस्कार, पत्नी का साथ, ईमानदारी से नौकरी।
एक दिन सविता ने कहा,
“आजकल तुम बहुत शांत लगते हो।”
गणेश मुस्कराए,
“क्योंकि अब मैंने इच्छाओं को पीछे रख दिया है। अब मैं यह देखता हूँ कि मैंने आज अपना फर्ज निभाया या नहीं। अगर निभाया, तो मैं खुश।”
उन्हें समझ आ गया था कि स्वर्ग कोई दूर की जगह नहीं है। वह वहीं बनता है, जहाँ इंसान अपने कर्तव्यों को प्रेम से निभाता है। इच्छाएँ पूरी हों या न हों, अगर दिल में यह संतोष हो कि “मैंने जो करना था, वह किया”—तो वही सच्ची खुशी है।
अब गणेश पाटिल बड़े आदमी नहीं बने, पर अच्छे बेटे, अच्छे पिता और अच्छे पति जरूर बन गए। और इसी में उन्हें वह सुख मिल गया, जिसकी तलाश वे बरसों से कर रहे थे।

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Rajeev Verma

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