लघु कथा -92

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के एक छोटे से कस्बे में कैलाश प्रसाद रहते थे। बचपन से ही उनके मन में बड़े-बड़े सपने थे। वे कहते थे, “मैं बहुत बड़ा आदमी बनूँगा, बड़ा घर होगा, कई गाड़ियाँ होंगी, लोग मेरा नाम आदर से लेंगे।” गाँव के लोग हँसते, पर कैलाश अपने सपनों में ही जीते रहते।
पढ़ाई पूरी करके वे शहर गए। सोचा था, कुछ ही सालों में करोड़पति बन जाएँगे। पर नौकरी छोटी मिली, तनख्वाह कम थी। कैलाश हर समय दुखी रहते। कहते,
“मेरे सपने इतने बड़े थे, और जिंदगी ने मुझे इतना छोटा क्यों बना दिया?”
उन्होंने कई काम बदले—कभी दुकान खोली, कभी एजेंसी ली, कभी शेयर बाजार में पैसा लगाया। हर बार उम्मीद बहुत बड़ी होती, पर नतीजा छोटा निकलता। कभी घाटा हुआ, कभी बस बराबर। कैलाश को लगता, दुनिया उनके खिलाफ है।
एक दिन वे अपने गाँव लौटे। रास्ते में बस खराब हो गई। सब यात्री एक ढाबे पर रुके। वहाँ एक बूढ़ा चायवाला बैठा था—नाम था हरिहर। वह चाय बनाते हुए गुनगुना रहा था।
कैलाश ने कहा,
“बाबा, तुम्हें कोई चिंता नहीं है क्या? इतनी छोटी दुकान, इतना कम काम।”
हरिहर मुस्कराया,
“चिंता तो सबको होती है, बेटा। पर मैं उतनी ही करता हूँ, जितनी मेरी ताकत है। बाकी भगवान और दुनिया पर छोड़ देता हूँ।”
कैलाश बोला,
“पर आपके बड़े सपने नहीं हैं?”
हरिहर हँसा,
“बड़े सपने हों, यह बुरा नहीं। पर उन्हें पूरा होना मेरी मुट्ठी में नहीं है। इसके लिए रास्ता, लोग और हालात भी साथ देने चाहिए। अगर वे साथ न दें, तो क्या मैं रो-रोकर मर जाऊँ?”
कैलाश चुप हो गया। उसे लगा जैसे बूढ़े ने उसके दिल की बात कह दी हो।
गाँव पहुँचकर कैलाश ने देखा कि उसके बचपन का दोस्त मोहन खेती कर रहा है। उसके पास न बड़ी गाड़ी थी, न बड़ा घर, पर चेहरा शांत था।
कैलाश ने पूछा,
“मोहन, तुझे कभी नहीं लगता कि तू कुछ बड़ा कर सकता था?”
मोहन बोला,
“कर सकता था, पर जो मिला है, उसी में मैं खुश हूँ। मैं कोशिश करता हूँ, पर अगर मौसम खराब हो जाए, बारिश न आए, तो क्या मैं आसमान से लड़ूँ?”
कैलाश को समझ आने लगा—वह हमेशा दुनिया से वही चाहता रहा, जो शायद दुनिया दे ही नहीं सकती।
कुछ दिन गाँव में रहकर कैलाश ने अपने सपनों पर दोबारा सोचा। उसने तय किया कि अब वह कोशिश करेगा, पर नतीजे से लड़ाई नहीं करेगा। वह नौकरी करेगा, साथ में छोटा व्यापार भी, पर इतना ही सपना रखेगा जितना हालात पूरा कर सकें।
शहर लौटकर उसने एक साधारण काम पकड़ा और शाम को बच्चों को पढ़ाने लगा। पैसा बहुत नहीं बढ़ा, पर मन हल्का हो गया।
एक दिन उसने सोचा,
“दुख इस बात का नहीं था कि सपने पूरे नहीं हुए। दुख इस बात का था कि मैंने मान लिया था—उन्हें पूरा होना ही चाहिए।”
अब कैलाश जान गया था—दुनिया सिर्फ उसके लिए नहीं बनी। हालात, लोग और समय—सब मिलकर ही किसी सपना को सच करते हैं। इसलिए आदमी का काम है कोशिश करना, बाकी को स्वीकार करना।
अब कैलाश पहले से ज्यादा शांत था। उसके सपने छोटे हो गए थे, पर उसकी नींद बड़ी हो गई थी।

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Rajeev Verma

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