लघु कथा -91

चेन्नई के पास एक छोटे से कस्बे में श्रीनिवास अय्यर रहते थे। वे एक साधारण स्कूल में गणित पढ़ाते थे। तनख्वाह ज्यादा नहीं थी, पर जीवन शांत था। उनकी पत्नी लक्ष्मी, घर संभालती थीं और दो बच्चे पढ़ते थे। पड़ोस में ही एक बड़ा बंगला था, जहाँ रघुनाथ रेड्डी रहते थे—शहर के बड़े व्यापारी, जिनके पास कारें थीं, नौकर थे, और पैसा था।
लोग अक्सर श्रीनिवास से कहते,
“देखो, रेड्डी साहब कितने सुखी हैं। उनके पास सब कुछ है।”
स्रीनिवास मुस्करा देते,
“सुख चीजों से नहीं, मन से आता है।”
एक दिन स्कूल की छुट्टी के बाद श्रीनिवास रेड्डी के घर गए। रेड्डी साहब ने उन्हें बड़े आदर से बैठाया, पर उनके चेहरे पर थकान और चिंता साफ दिख रही थी।
रेड्डी बोले,
“अय्यर जी, मैं रात को सो नहीं पाता। डर लगता है—कहीं मेरा पैसा डूब न जाए, कहीं मेरा नौकर धोखा न दे दे, कहीं कोई और मुझसे आगे न निकल जाए।”
श्रीनिवास ने कहा,
“पर लोग तो आपको बहुत सुखी समझते हैं।”
रेड्डी हँस पड़े,
“यह सिर्फ दिखावा है। असली बात कोई नहीं जानता।”
उसी शाम श्रीनिवास ने देखा कि रेड्डी के बेटे को डाँट पड़ रही थी, क्योंकि वह दूसरे व्यापारी के बेटे से कम नंबर लाया था। घर में हर बात तुलना से शुरू और तुलना पर खत्म होती थी।
अगले दिन श्रीनिवास अपने दोस्त वेंकट के घर गए। वेंकट एक ऑटो चलाता था। उसका घर छोटा था, पर वहाँ हँसी थी। बच्चे खेल रहे थे, पत्नी गाना गुनगुना रही थी। वेंकट बोला,
“अय्यर जी, आज कमाई कम हुई, पर चावल है, दाल है, बस बहुत है।”
श्रीनिवास ने मन ही मन सोचा—यह आदमी कम में खुश है।
कुछ दिनों बाद कस्बे में बड़ा आयोजन हुआ। रेड्डी साहब ने सबसे बड़ा पंडाल लगवाया, ताकि सब जानें कि वे कितने बड़े हैं। पर उसी दिन खबर आई कि उनका एक बड़ा सौदा टूट गया। रेड्डी साहब घबरा गए। पंडाल में मुस्कराते हुए घूम रहे थे, पर भीतर से टूट चुके थे।
स्रीनिवास ने उन्हें अलग ले जाकर कहा,
“आप ऊपर देखने की आदत में जलते रहते हैं। हमेशा कोई आपसे आगे है—इसी आग में आप जल रहे हैं।”
रेड्डी ने सिर झुका लिया,
“सच कहते हो। मैं कभी नीचे नहीं देखता, कभी अपने पास जो है, उसका सुख नहीं लेता।”
उसी रात रेड्डी साहब बीमार पड़ गए। डॉक्टर ने कहा,
“बहुत तनाव है। अगर मन को शांत नहीं किया, तो शरीर साथ नहीं देगा।”
रेड्डी साहब पहली बार वेंकट के घर गए। वहाँ साधारण खाना था, पर हँसी थी। रेड्डी बोले,
“वेंकट, तुम्हारे पास कम है, फिर भी तुम खुश कैसे हो?”
वेंकट हँसकर बोला,
“साहब, मैं अपने से ऊपर नहीं देखता। जो है, उसी में खुश हूँ।”
रेड्डी की आँखें भर आईं। उन्हें लगा कि वे सारी जिंदगी गलत दौड़ में भागते रहे।
कुछ महीनों बाद रेड्डी साहब ने अपना काम थोड़ा कम कर दिया। बच्चों पर तुलना का बोझ घटाया। उन्होंने सीखा कि सुख और दुख मन के ख्यालों से बनते हैं।
अब कस्बे में लोग कहते,
“रेड्डी साहब बदल गए हैं, अब पहले से ज्यादा शांत हैं।”
स्रीनिवास मुस्कराकर कहता,
“जिसने ऊपर देखना छोड़ दिया और अपने पास देखना सीख लिया, वही सच में सुखी हो गया।”

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Rajeev Verma

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