लघु कथा -90

शहर के एक पुराने मोहल्ले में नरेश रहता था। उसके पास दो कमरों का मकान था, सरकारी दफ्तर की नौकरी थी और घर में माँ-बाप तथा पत्नी थी। फिर भी नरेश हमेशा उदास रहता। उसे लगता था कि उसकी जिंदगी कठिनाइयों से भरी है। वह रोज़ कहता, “मेरे साथ ही सब गलत क्यों होता है? लोग मुझसे आगे निकल गए।”
एक दिन दफ्तर में उसने अपने साथी सुरेश से कहा,
“यार, मेरी तो किस्मत ही खराब है। न प्रमोशन मिला, न गाड़ी खरीद पाया।”
सुरेश मुस्कराया,
“भाई, कभी नीचे भी देखकर तो देखो।”
नरेश को यह बात अजीब लगी, पर उसने कुछ नहीं कहा।
रविवार को सुरेश नरेश को अपने साथ झोंपड़पट्टी ले गया, जहाँ वह समाजसेवा करता था। नरेश पहले मना कर रहा था, पर ज़िद करने पर चला गया। वहाँ उसने जो देखा, उसने उसे हिला दिया। छोटी-छोटी झोपड़ियाँ, गंदा पानी, नंगे पाँव बच्चे, फटे कपड़े, और सूखे चेहरे।
एक आदमी बोला,
“भैया, आज काम नहीं मिला। आज बच्चों को सिर्फ चाय और सूखी रोटी मिलेगी।”
एक औरत पास बैठी थी, जिसकी गोद में बीमार बच्चा था। उसने कहा,
“दवा के पैसे नहीं हैं, भगवान जाने क्या होगा।”
नरेश का सिर झुक गया। उसे याद आया कि वह सुबह इसलिए नाराज़ हुआ था कि उसकी शर्ट ठीक से प्रेस नहीं हुई थी।
वहाँ के बच्चे मिट्टी के ढेर पर खेल रहे थे, टूटे खिलौनों से भी खुश थे। उनकी हँसी में कोई शिकायत नहीं थी, जबकि उनके पास कुछ भी नहीं था।
वापस लौटते समय नरेश बिल्कुल चुप था। सुरेश ने कहा,
“अब बताओ, तुम्हारी जिंदगी सच में इतनी दुखी है?”
नरेश धीरे से बोला,
“नहीं… मैं तो उलटा देख रहा था। मैं हमेशा आसमान की ओर देखता था—जो मेरे पास नहीं है, वही देखता था।”
रात को वह देर तक सोचता रहा। उसे लगा कि उसके दुख असल में तुलना से पैदा हुए थे।
अगली सुबह उसने अपनी माँ से कहा,
“माँ, आज मुझे समझ आया कि हम कितने सुखी हैं।”
माँ ने पूछा,
“कैसे?”
नरेश बोला,
“हमारे पास छत है, रोज़ का खाना है, कपड़े हैं, इलाज की सुविधा है। मैं इन सबको सामान्य समझकर, जो नहीं है उसी का रोना रोता था।”
माँ ने कहा,
“बेटा, जिसने अपना सुख गिनना सीख लिया, वह दुखी नहीं रह सकता।”
कुछ ही दिनों में नरेश बदल गया। अब वह दफ्तर में भी खुश रहता, घर में भी। वह सुरेश के साथ झोंपड़पट्टी जाने लगा। पुराने कपड़े, किताबें और थोड़ा-बहुत पैसा इकट्ठा करके वहाँ देता। उसे लगता था कि देने से उसका मन और हल्का हो जाता है।
एक दिन दफ्तर में किसी ने कहा,
“नरेश, अब तो तुम बहुत खुश दिखते हो।”
नरेश मुस्कराया,
“हाँ, क्योंकि अब मैं उलटा नहीं देखता। पहले मैं ऊपर देखता था—जो मेरे पास नहीं है। अब मैं नीचे और चारों ओर देखता हूँ—जो मेरे पास है और जो दूसरों के पास नहीं है।”
उसे समझ आ गया था कि सुख-दुख परिस्थितियों में नहीं, नजरिए में होते हैं। जो आदमी अपने अभाव गिनता है, वह दुखी होता है। जो अपनी सुविधाएँ गिनता है, वह सुखी होता है।
अब नरेश हर सुबह मन ही मन कहता,
“मैं बहुत सुखी हूँ, क्योंकि मेरे पास जीने के साधन भी हैं और किसी और की मदद करने की ताकत भी।”

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Rajeev Verma

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