लघु कथा -89

शहर के एक मध्यमवर्गीय मोहल्ले में अरुण रहता था। उसके पास पक्के मकान की छत थी, रोज़ का खाना था और एक छोटी-सी नौकरी भी। फिर भी उसका चेहरा हमेशा उदास रहता। उसे लगता था कि उसकी जिंदगी दुखों से भरी है। सुबह उठते ही कहता, “मेरे पास कुछ भी नहीं है। लोग मुझसे आगे निकल गए।”
एक दिन दफ्तर में उसके साथी रमाकांत ने कहा,
“यार, तुम हमेशा दुखी क्यों रहते हो? तुम्हारे पास तो बहुत कुछ है।”
अरुण बोला,
“बहुत कुछ? मेरे पास न बड़ी कार है, न बड़ा घर, न ऊँची पोस्ट।”
रमाकांत चुप हो गया, पर उसके मन में कुछ चल रहा था।
रविवार को रमाकांत अरुण को अपने साथ झोंपड़पट्टी ले गया, जहाँ वह बच्चों को पढ़ाने जाता था। अरुण पहले तो झिझका, पर फिर चला गया। वहाँ उसने देखा—टीन की छत, मिट्टी की दीवारें, गंदा पानी, नंगे पाँव बच्चे। कई बच्चों ने फटी शर्ट पहनी थी। एक बूढ़ा आदमी सड़क किनारे बैठा खाँस रहा था।
एक छोटी बच्ची बोली,
“भैया, आज स्कूल नहीं जाऊँगी, माँ बीमार है, काम करने नहीं गई, आज चूल्हा नहीं जलेगा।”
अरुण का दिल काँप गया। उसे लगा जैसे उसके सारे दुख छोटे पड़ गए हों।
रमाकांत ने कहा,
“इन लोगों के पास न पक्का घर है, न रोज़ की नौकरी, न पक्का खाना। फिर भी देखो, बच्चे खेल रहे हैं, हँस रहे हैं।”
अरुण ने देखा—कुछ बच्चे कंचे खेल रहे थे, कुछ टूटे खिलौने से भी खुश थे। उनकी हँसी में कोई शिकायत नहीं थी।
वापस लौटते समय अरुण चुप था। रात को उसे नींद नहीं आई। उसे याद आया कि वह रोज़ अपने कमरे में बैठकर अपने न होने वाले दुखों का रोना रोता है, जबकि असली दुख तो कहीं और हैं।
अगले दिन सुबह उसने अपनी माँ से कहा,
“माँ, आज मुझे लगा कि मैं बहुत सुखी हूँ।”
माँ चकित होकर बोली,
“अचानक कैसे?”
अरुण बोला,
“मेरे पास छत है, कपड़े हैं, रोज़ का खाना है, नौकरी है। मैं तो आसमान की ओर देखता था—जो मेरे पास नहीं है, वही देखता था। नीचे नहीं देखता था—जिनके पास कुछ भी नहीं है।”
माँ की आँखें भर आईं।
“बेटा, जिसने तुलना करना सीख लिया, वह रोना छोड़ देता है।”
कुछ दिनों बाद अरुण भी रमाकांत के साथ झोंपड़पट्टी जाने लगा। वह बच्चों को पढ़ाने लगा, पुराने कपड़े इकट्ठा करके देने लगा। अब उसे लगता था कि जितना वह देता है, उससे ज्यादा उसे मिलता है—मन की शांति।
एक दिन दफ्तर में वही साथी बोला,
“आजकल तो तुम बड़े खुश रहते हो।”
अरुण मुस्कराया,
“हाँ, क्योंकि अब मैं उलटा नहीं देखता। पहले मैं ऊपर देखता था—जो मेरे पास नहीं है। अब मैं चारों ओर देखता हूँ—जो मेरे पास है और जो दूसरों के पास नहीं है।”
उसे समझ आ गया था कि दुख और सुख चीजों में नहीं, देखने के ढंग में होते हैं। जो आदमी अपने अभाव गिनता है, वह दुखी होता है। जो अपनी सुविधाएँ गिनता है, वह सुखी होता है।
अब अरुण रोज़ सुबह उठकर भगवान को धन्यवाद देता—
“तूने मुझे इतना दिया है कि मैं जी सकूँ और इतना दिया है कि मैं किसी और को भी थोड़ा दे सकूँ।”

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Rajeev Verma

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