लघु कथा -88

गाँव के किनारे एक छोटा-सा घर था, जहाँ भोलानाथ रहते थे। उनका चेहरा हमेशा शिकायतों से भरा रहता। सुबह उठते ही कहते, “धूप बहुत तेज है, काम कैसे करूँ?” बारिश होती तो बोलते, “कीचड़ में पैर फँस जाते हैं।” ठंड आती तो कहते, “हाथ-पैर जम जाते हैं।” लगता था जैसे उन्हें हर मौसम से शिकायत है।
उनके पड़ोस में विजय रहता था। विजय गरीब था, पर हँसमुख। वह सुबह-सुबह खेत जाते हुए पेड़ों से गिरती धूप को देखकर मुस्कराता, पक्षियों की आवाज़ सुनकर गुनगुनाता। लोग कहते, “विजय तो हर हाल में खुश रहता है।”
एक दिन भोलानाथ बहुत उदास बैठे थे। उनकी फसल ठीक नहीं हुई थी। वे बोले,
“जिंदगी ने मुझे कुछ नहीं दिया, बस दुख ही दिया है।”
विजय पास आया और बोला,
“भाई, दुख सबको मिलता है, पर उसे देखने का तरीका अलग होता है।”
भोलानाथ झुँझलाकर बोले,
“तेरे पास क्या है? फिर भी तू हँसता रहता है!”
विजय मुस्कराया,
“मेरे पास हँसने की वजहें हैं—आसमान, हवा, पेड़, नदियाँ, ये सब मुफ्त में मिलते हैं।”
अगले दिन विजय भोलानाथ को अपने साथ ले गया। सुबह-सुबह दोनों नदी किनारे पहुँचे। सूरज निकल रहा था। बादल लाल-पीले रंग में चमक रहे थे। नदी कलकल करती बह रही थी।
विजय ने कहा,
“देख, आसमान हँस रहा है। क्या तुझे नहीं लगता कि ये रंग तुझे बुला रहे हैं मुस्कराने के लिए?”
भोलानाथ ने पहली बार ध्यान से देखा। सच में, दृश्य सुंदर था। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
फिर दोनों खेतों में गए। हवा चल रही थी, फसल लहर रही थी। विजय बोला,
“जब हवा खेतों से बात करती है, तो लगता है जैसे धरती गुनगुना रही हो।”
भोलानाथ हँस पड़ा,
“तू तो कवि निकला!”
विजय बोला,
“कवि वही है, जिसे सब कुछ हँसता हुआ दिखाई दे।”
कुछ दिनों तक भोलानाथ विजय के साथ घूमने लगा। कभी बच्चों के खेल को देखता, कभी बारिश में भीगते पेड़ों को। धीरे-धीरे उसकी शिकायतें कम होने लगीं। जो बात पहले उसे खटकती थी, अब उसमें भी मज़ा ढूँढने लगा।
एक दिन गाँव में मेला लगा। पहले भोलानाथ ऐसे मेलों में नहीं जाता था—कहता था, “भीड़ में धक्का लगता है, शोर मचता है।” पर इस बार वह गया। बच्चों की हँसी, ढोल की थाप, रंग-बिरंगे गुब्बारे देखकर उसे अच्छा लगा। वह खुद भी बच्चों के साथ हँसने लगा।
लोग चकित थे—
“अरे, ये वही भोलानाथ है जो हमेशा रोता-झींकता रहता था?”
भोलानाथ ने कहा,
“हाँ, वही हूँ। पर अब समझ गया हूँ कि शिकायतों से जिंदगी भारी हो जाती है। हँसी से हल्की।”
कुछ समय बाद भोलानाथ बीमार पड़ा। डॉक्टर ने कहा,
“तुम पहले बहुत तनाव में रहते थे, इसलिए शरीर कमजोर हो गया। अब तुम खुश रहते हो, इसलिए जल्दी ठीक हो जाओगे।”
भोलानाथ ने विजय का हाथ पकड़कर कहा,
“तूने मुझे जिंदगी का राज बता दिया—जो हँसना जानता है, वही सच में जीना जानता है।”
उस दिन से भोलानाथ जहाँ जाता, लोगों को यही कहता,
“जो है, उसी में मुस्कराना सीखो। आकाश, नदी, हवा—सब हमें हँसने का बहाना दे रहे हैं। बस आँख और दिल खुले होने चाहिए।”

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Rajeev Verma

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