लघु कथा -87

शहर की सबसे भीड़भाड़ वाली गली में मोहनलाल रहते थे। कभी यह गली भाईचारे के लिए जानी जाती थी। एक-दूसरे के घर बिना बुलाए लोग चले जाते, दुख-सुख बाँटते। पर अब हर घर के दरवाज़े पर मोटे ताले लगे रहते, और हर चेहरे पर शक की रेखाएँ।
मोहनलाल का परिवार बड़ा था, पर मन छोटा होता जा रहा था। भाइयों में जमीन को लेकर झगड़ा चल रहा था। हर कोई डरता था कि दूसरा कहीं धोखा न दे दे। माँ की बीमारी में भी सब गिन-गिनकर पैसे देते, और उसी में तकरार हो जाती।
एक दिन मोहनलाल की पुरानी पड़ोसन, शांति बुआ, बीमार पड़ गईं। उनका बेटा शहर से बाहर था। पहले के जमाने में पूरा मोहल्ला उनकी सेवा करता, पर इस बार कोई आगे नहीं आया। सब बोले,
“किसके चक्कर में पड़ें? कल को उल्टा हमें ही फँसा दें।”
मोहनलाल का दिल बेचैन हुआ। उसने पत्नी से कहा,
“अगर आज हम चुप रहे, तो कल हमारे लिए भी कोई नहीं बोलेगा।”
पत्नी डरी हुई थी,
“आजकल किसी के लिए कुछ करो तो लोग शक करने लगते हैं। फालतू में मुसीबत मोल क्यों लें?”
फिर भी मोहनलाल शांति बुआ के घर गया। उनके लिए दवा लाया, खाना बनाया। बुआ की आँखों में आँसू आ गए।
“बेटा, आजकल तो अपने भी अपने नहीं रहे। तूने तो मुझे जीने की हिम्मत दे दी।”
इधर घर में हंगामा मच गया। भाई बोले,
“तू पराए के लिए इतना करता है, और हमारे हिस्से की जमीन पर नज़र रखता है!”
मोहनलाल चुप रहा। उसे लगा कि आदमी दुश्मनों से कम, अपने ही लोगों से ज़्यादा डरने लगा है।
कुछ दिनों बाद गली में आग लग गई। एक घर से उठी चिंगारी कई घरों तक फैल गई। लोग घबरा गए। पहले सब मिलकर बुझाते, पर अब हर कोई पहले अपना सामान बचाने लगा। शांति बुआ अपने घर से निकल नहीं पा रही थीं।
मोहनलाल दौड़ा और उन्हें सहारा देकर बाहर लाया। उसकी देखा-देखी दो-तीन और लोग आगे आए। आग बुझी, बड़ा नुकसान टल गया।
तभी लोगों को एहसास हुआ कि अगर मोहनलाल अकेला ही सोचता रहता, तो शायद कई जानें चली जातीं। शांति बुआ ने सबके सामने कहा,
“अगर आज भी हम सिर्फ अपना ही सोचते रहे, तो आदमी जिंदा रहेगा, पर इंसान मर जाएगा।”
उस दिन मोहल्ले में चुप्पी छा गई। सबको लगा कि सच में आत्मीयता खत्म होती जा रही है—बढ़ती भीड़, बढ़ता स्वार्थ, बढ़ती चालाकी ने दिलों को छोटा कर दिया है।
मोहनलाल ने भाइयों से कहा,
“जमीन बाँट लोगे, पैसे बाँट लोगे, पर दिल अगर बँट गया तो कोई किसी का नहीं रहेगा।”
धीरे-धीरे लोगों ने फिर एक-दूसरे की ओर देखना शुरू किया। पूरी तरह पुराना जमाना तो नहीं लौटा, पर इतना जरूर हुआ कि कोई बीमार पड़े तो कोई न कोई हाल पूछने आ जाता।
मोहनलाल समझ गया—बुरे समय में भी अगर कुछ लोग मनुष्यता बचाए रखें, तो आदमी के भीतर का इंसान पूरी तरह नहीं मरता। बस, उसे ज़िंदा रखने के लिए किसी एक को शुरुआत करनी पड़ती है।

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Rajeev Verma

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