लघु कथा -86

शहर के पुराने मोहल्ले में रामस्वरूप काका रहते थे। उनका मकान बड़ा था, पर दिल उससे भी बड़ा। कभी उनका परिवार छोटा और खुशहाल था—वे, उनकी पत्नी शारदा और दो बच्चे। धीरे-धीरे बच्चों की शादी हुई, बहुएँ आईं, फिर पोते-पोतियाँ। घर हँसी से भर गया, पर साथ ही जिम्मेदारियाँ भी बढ़ती चली गईं।
समय बदला, काम महँगा हुआ, रोटी की कीमत बढ़ी, पानी के लिए लाइनें लगने लगीं। रामस्वरूप काका रोज़ सुबह पानी भरने के लिए दो-दो घंटे कतार में खड़े रहते। घर में बीस लोग हो गए थे। एक कमरे में चार-चार लोग सोते, रसोई में हमेशा झगड़ा रहता—किसने कितना खाया, किसने कम छोड़ा।
एक दिन काका अपने मित्र शिवनारायण से मिलने गए। शिवनारायण जापान में कई साल काम करके लौटा था। उसके घर में सिर्फ वह, उसकी पत्नी और एक बेटी थी। घर छोटा था, पर साफ और शांत। खाना समय पर बनता, सब आराम से खाते।
काका ने कहा,
“भाई, तुम्हारे यहाँ तो बड़ा सुकून है, हमारे यहाँ तो बस शोर और चिंता।”
शिवनारायण मुस्कराया,
“काका, हमने सोच-समझकर छोटा परिवार रखा। आज दुनिया में जनसंख्या इतनी बढ़ रही है कि आदमी को रोटी, पानी, हवा—सबके लिए लड़ना पड़ रहा है। बड़ा परिवार आज सुख नहीं, बोझ बनता जा रहा है।”
काका चुप हो गए। उन्हें याद आया कि उनके घर में रोज़ कोई न कोई बीमार पड़ जाता है, क्योंकि साफ पानी कम पड़ता है। बच्चों की फीस भरने में झगड़े होते हैं। किसी को नई चप्पल चाहिए, तो किसी को किताब। पैसे हमेशा कम पड़ते।
उसी शाम काका घर लौटे। देखा कि बहुएँ रसोई में झगड़ रही थीं—चावल कम पड़ गए थे। एक पोता भूखा बैठा रो रहा था। काका का दिल भर आया।
रात को उन्होंने सबको इकट्ठा किया और बोले,
“बच्चो, जब तुम छोटे थे, तब हमने बिना सोचे-समझे परिवार बढ़ाया। हमें लगा, ज्यादा बच्चे मतलब ज्यादा खुशी। पर आज देख रहा हूँ—हम सब परेशान हैं। खाना कम है, जगह कम है, शांति तो बिल्कुल नहीं।”
एक बेटा बोला,
“पिताजी, अब क्या किया जा सकता है? बच्चे तो हो ही गए।”
काका ने गहरी साँस ली,
“जो हो गया, उसे बदला नहीं जा सकता। पर आगे की पीढ़ी को तो समझा सकते हैं। अगर तुम अपने बच्चों को यही सिखाओ कि छोटा परिवार, सुखी परिवार होता है, तो शायद उनका भविष्य अच्छा हो।”
कुछ दिनों बाद परिवार में एक नई बहू आई। सबने उसे समझाया कि अभी बच्चे की जल्दी न करे, पहले अपने जीवन को सँभाले। बहू ने भी समझदारी दिखाई।
धीरे-धीरे घर में बदलाव आने लगा। बच्चे स्कूल जाने लगे, सबने मिलकर खर्च बाँटना सीखा, पानी और अनाज बचाकर इस्तेमाल होने लगा। झगड़े पूरी तरह खत्म नहीं हुए, पर समझ बढ़ने लगी।
रामस्वरूप काका अक्सर कहते,
“आज हालात ऐसे हैं कि अगर आदमी ने खुद पर काबू नहीं रखा, तो भूख और प्यास ही उसे मार देंगी। एटम बम की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसलिए जो समझदार है, वही है जो कम में खुश रहना सीख ले।”
उनकी बात धीरे-धीरे मोहल्ले में फैल गई। कुछ लोगों ने छोटा परिवार अपनाने का फैसला किया। काका मन ही मन खुश होते—उन्हें लगता था कि शायद आने वाली पीढ़ी भूख और अशांति से नहीं, समझ और संतुलन से जिएगी।

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Rajeev Verma

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