लघु कथा -85

गाँव के बाहर एक छोटा-सा आश्रम था, जहाँ हर दिन सुबह-शाम दीप जलता और घंटियों की मधुर ध्वनि गूँजती। उस आश्रम में दो मूर्तियाँ थीं—एक देवी विद्या की और दूसरी देव करुणा की। गाँव वाले कहते थे कि ये दो अलग-अलग नहीं, बल्कि जीवन के दो रास्तों के प्रतीक हैं—एक आत्म-संस्कार का और दूसरा उदार सेवा का।
आश्रम की देखभाल एक वृद्ध पुजारी करते थे—नाम था हरिनाथ। वे बच्चों को पढ़ाना, बीमारों की सेवा करना और दुखियों को ढाढ़स बँधाना—सब कुछ अपने जीवन का उद्देश्य मानते थे। उनके पास एक शिष्य था—रोहित, जो तेज दिमाग वाला था, पर थोड़ा घमंडी भी। वह विद्या देवी की पूजा में अधिक रुचि रखता था। उसे लगता था कि ज्ञान ही सबसे बड़ा बल है।
एक दिन गाँव में अकाल पड़ा। लोग भूखे रहने लगे। कई परिवार शहर की ओर पलायन करने लगे। रोहित ने देखा कि आश्रम में भी अन्न कम होता जा रहा है। उसने हरिनाथ से कहा,
“गुरुजी, हमें विद्या देवी की पूजा और कठिन करनी चाहिए, ताकि बुद्धि बढ़े और हम कोई उपाय खोज सकें।”
हरिनाथ मुस्कराए और बोले,
“बेटा, उपाय तो बुद्धि से मिलेगा, पर पीड़ा का निवारण करुणा से होता है। अगर सामने कोई भूखा है, तो पहले उसे रोटी चाहिए, तर्क नहीं।”
उसी शाम एक बूढ़ी स्त्री आश्रम आई। उसके हाथ काँप रहे थे, आँखों में आँसू थे। बोली,
“बाबा, मेरे पोते को तीन दिन से कुछ खाने को नहीं मिला।”
रोहित ने सोचा—पहले योजना बनानी चाहिए, तभी मदद होगी। पर हरिनाथ ने बिना देर किए आश्रम का बचा-खुचा अनाज उसे दे दिया। रोहित बोला,
“गुरुजी, अगर हम सब दे देंगे तो खुद क्या खाएँगे?”
हरिनाथ ने शांत स्वर में कहा,
“जो उदारता के लिए खड़ा होता है, उसका पेट कभी खाली नहीं रहता, क्योंकि उसके लिए दुनिया की रसोई खुल जाती है।”
अगले दिन रोहित शहर गया। उसने अपने ज्ञान का उपयोग कर कुछ व्यापारियों को समझाया कि अगर वे गाँव की मदद करेंगे, तो बाद में गाँव उनका स्थायी बाज़ार बनेगा। उसकी बात समझ में आई। व्यापारियों ने अनाज और बीज देने का वादा किया।
जब रोहित लौटा तो देखा कि हरिनाथ बीमारों की सेवा में लगे हैं। वे लोगों के घाव धो रहे थे, बच्चों को अपने हाथों से खिला रहे थे। रोहित को पहली बार समझ आया कि ज्ञान और करुणा अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
कुछ दिनों में गाँव की हालत सुधर गई। खेतों में बीज बोए गए, भंडार भरने लगे। गाँव वालों ने आश्रम में आकर धन्यवाद दिया। किसी ने कहा,
“रोहित के ज्ञान ने रास्ता दिखाया।”
दूसरे ने कहा,
“हरिनाथ की करुणा ने हमें जीने की ताकत दी।”
रोहित ने दोनों मूर्तियों के सामने सिर झुकाया। अब उसे समझ आ गया था—देवी-देवताओं को दो वर्गों में बाँटना केवल समझाने के लिए है। असल में जीवन में दोनों का मेल ज़रूरी है—व्यक्तित्व को सँवारने वाला ज्ञान और दूसरों को उठाने वाली उदारता।
उस दिन से रोहित ने प्रण लिया—वह न केवल विद्या की साधना करेगा, बल्कि हर पीड़ित के लिए हाथ भी बढ़ाएगा। क्योंकि सच्ची भक्ति वही है, जो मनुष्य को मनुष्य के काम आने के लिए प्रेरित करे।

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Rajeev Verma

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